कभी सड़क पर कबाड़ चुनते थे बच्चे, अब ‘Masti Ki Pathshala’ से संवार रहे भविष्य, Tata Steel ने बदली जिंदगी
कभी कचरा और कबाड़ चुनने वाले बच्चों को टाटा स्टील की ‘मस्ती की पाठशाला’ ने शिक्षा से जोड़ा. ब्रिज कोर्स, स्कूल में दाखिला और बेहतर सुविधाओं के जरिए हजारों बच्चों को मुख्यधारा में लाने की कोशिश की गई.
टीएनपी डेस्क(TNP DESK):टाटा स्टील केवल एक स्टील कंपनी नहीं है, बल्कि एक ऐसी संस्था है, जो वर्षों से जमशेदपुर के साथ इंसानियत को आगे बढ़ाने का काम करती है. जहां शहरवासियों के लिए भी कई सुविधाओं का इंतजाम किया जाता है. बिजली, पानी, सड़क, हरियाली और साफ-सफाई के साथ लोगों को यहां रहने का मौका मिलता है. टाटा स्टील केवल अपने मुनाफे का सौदा नहीं करती, बल्कि अपने शहर में रहने वाले हर एक इंसान की फिक्र करती है और उनकी समस्याओं का समाधान करने की भी कोशिश करती है. आज हम टाटा स्टील की एक ऐसी पहल के बारे में बताने वाले हैं, जिसकी वजह से आज सड़क पर कचरा चुनने वाले, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले और बाल मजदूरी करने वाले बच्चे स्कूलों में अपने भविष्य को संवार रहे हैं. आज हम टाटा स्टील की ‘मस्ती की पाठशाला’ की बात करेंगे, जहां सड़क पर कचरा चुनने वाले, कबाड़ चुनने वाले और मजदूर बनने वाले बच्चों को कैसे शिक्षा से जोड़ा गया.

2016 में टाटा स्टील ने की थी पहल
जमशेदपुर में टाटा स्टील की ओर से साल 2016 में एक अनोखी पहल की गई थी, जहां मस्ती की पाठशाला नाम का एक ऐसा अभियान शुरू किया गया था, जहां सड़क पर कचरा चुनने वाले बच्चे, बाल मजदूरी करने वाले बच्चे या फिर ऐसे बच्चे जो झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं और सड़कों पर अपना जीवन बिताते हैं, उनके लिए शिक्षा का सपना और स्कूल जाने की चाह केवल एक सपना बनकर रह जाती है. लेकिन टाटा स्टील ने ऐसे बच्चों को भी भविष्य की दिशा में बेहतर बदलाव किया, जहां उन्हें सड़क से उठाकर शिक्षा से जोड़ा गया. बच्चों के लिए आवासीय ब्रिज कोर्स की शुरुआत की गई, जहां स्कूल से बाहर बच्चों या फिर बाल श्रम और बेहद कठिन परिस्थितियों में फंसे बच्चों को लाया जाता था और स्कूल जाने के लिए तैयार किया जाता था और फिर सरकारी या फिर प्राइवेट स्कूल में उन्हें पढ़ने के लिए एडमिशन कराया जाता है.

पढिए कैसे सड़क से स्कूल तक का सफर तय करते हैं बच्चे
बताया जाता है कि साल 2016 में सबसे पहले 100 बच्चों के लिए ब्रिज स्कूल की शुरुआत की गई थी, जिसका एक ही उद्देश्य था कि इन बच्चों को केवल कुछ समय के लिए ही पढ़ाना नहीं था. टाटा स्टील ने दूरदर्शी सोच के साथ इस पहल को आगे बढ़ाया और बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए और सम्मानपूर्वक जीवन आगे जीने के लिए तैयार किया, जहां टाटा स्टील फाउंडेशन के तहत कार्यक्रम के तहत रेजिडेंशियल ब्रिज स्कूल यानी आरबीसी और नॉन-रेजिडेंशियल ब्रिज स्कूल यानी एनआरबीसी के माध्यम से तैयार किया गया. इससे उन बच्चों को खासतौर पर फायदा हुआ, जो काफी जोखिम वाली परिस्थितियों में फंसे थे. इसमें कचरा चुनने वाले बच्चे, ईंट-भट्ठों में काम करने वाले बाल मजदूर, भिखारी और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले गरीब बच्चे शामिल थे. आपको बता दें कि यह योजना केवल गरीब परिवारों के बच्चों के लिए सामान्य स्कूली शिक्षा कार्यक्रम नहीं था, बल्कि टाटा स्टील का फोकस उन बच्चों पर है, जिनको बाल श्रम और असुरक्षित परिस्थितियों से बाहर निकालकर शिक्षा की राह पर लाना मुश्किल है.
मस्ती की पाठशाला कैसी काम करती है
अब चलिए आपको बताते हैं कि ‘मस्ती की पाठशाला’ कैसे काम करती है. इस मॉडल में पहले ऐसे बच्चों की पहचान की जाती है, जो स्कूल से बाहर हैं और जिनकी स्कूल जाने की उम्र हो चुकी है या फिर बाल मजदूरी कर रहे हैं. उन बच्चों को चिन्हित कर ब्रिज कोर्स के लिए दोबारा पढ़ाई के लिए तैयार किया जाता है. क्योंकि ऐसे बच्चे कभी स्कूल नहीं गए होते हैं, इसलिए उनके लिए यह सब कुछ नया होता है. इसलिए उन्हें कुछ देर तक आवासीय ब्रिज कोर्स में रखकर तैयार किया जाता है, ताकि वे स्कूल जाने लायक तैयार हो सकें. जमशेदपुर में शुरू किए गए आवासीय ब्रिज स्कूल में बच्चों को पढ़ाई के साथ भोजन, स्वास्थ्य देखभाल, बदलाव और बाकी सुविधाएं दी जाती हैं. वहां पर बच्चों के लिए सीखने को और आसान और रोचक बनाने के लिए ट्रेनिंग दी जाती है. बच्चों को खेल, सांस्कृतिक गतिविधियों और उसके साथ-साथ पढ़ाई से भी जोड़ा जाता है. ब्रिज कोर्स पूरा होने के बाद टाटा स्टील का लक्ष्य होता है कि सामान्य स्कूल में मेनस्ट्रीम करना है. टाटा स्टील ने बच्चों को अलग स्थान दिया और सरकारी स्कूल में दाखिला लेने की दिशा में काम किया, जहां साल 2017 में सबसे पहले 17 बच्चों को कक्षा तीन और चार में एडमिशन कराया गया था, जबकि बाद में ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ गई.

बाद में लड़कियों के लिए भी शुरू की गई थी पहल
आपको बता दें कि सबसे पहले यह सिर्फ लड़कों के लिए शुरू की गई थी, लेकिन साल 2018 में टाटा स्टील की ओर से लड़कियों के लिए भी पहल शुरू की गई, जहां सड़क या फिर असुरक्षित परिस्थितियों में जी रहे बच्चों को सुरक्षित वातावरण और शिक्षा मिल सके. आपको बता दें कि साल 2024-25 में टाटा स्टील की ओर से ग्रुप रिपोर्ट के मुताबिक 5,406 बेहद संवेदनशील बच्चों को ‘मस्ती की पाठशाला’ का लाभ मिला, जिसमें 73 प्रतिशत बच्चे मुख्यधारा के स्कूल में पहुंच पाए. इसके साथ ही टाटा स्टील फाउंडेशन की जानकारी के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2022 में 1,950 बच्चों को ‘मस्ती की पाठशाला’ पहल से जोड़ा गया था, जिसमें आवासीय और गैर-आवासीय विद्यालय से जुड़े बच्चे शामिल थे. इनमें से 1,056 बच्चों को स्कूल में मेनस्ट्रीम किया गया था. बताया जाता है कि साल 2023-24 की टाटा स्टील रिपोर्ट में ‘मस्ती की पाठशाला’ के माध्यम से 1,170 बच्चों के सरकारी स्कूल में मेनस्ट्रीम होने का उल्लेख किया गया है.
टाटा स्टील ने सफर किया आसान
बताया जाता है कि स्कूल बैग से कचरे के ढेर तक का सफर आसान नहीं था, लेकिन टाटा ग्रुप ने इसे आसान बनाया और हजारों बच्चों को मुख्यधारा और शिक्षा से जोड़ा, ताकि बच्चे शिक्षा से जुड़ सकें, ना कि सड़क पर भीख मांगें. कार्यक्रम का उद्देश्य बच्चों को सिर्फ पढ़ा-लिखाकर स्कूल भेजना नहीं, बल्कि उनका आत्मविश्वास बढ़ाना और खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों में आगे बढ़ाना है. बताया गया है कि ‘मस्ती की पाठशाला’ की यात्रा के दौरान 2025 में टाटा स्टील फाउंडेशन की मदद से 150 मस्ती की पाठशाला के बच्चों को पहली बार हवाई जहाज में सफर करने का मौका मिला. जहां बच्चों को रांची से 45 मिनट की जॉय फ्लाइट कराई गई, जहां उन्हें पायलट और केबिन क्रू से बातचीत करने का भी मौका मिला.इस तरह टाटा स्टील शहर के ऐसे बच्चों का भी ख्याल रख रही है जिनके बारे में कोई सोचने वाला नहीं है.