जब सिस्टम ने नहीं सुनी पुकार, तो ग्रामीणों ने खुद उठाया कुदाल-फावड़ा, 250 लोग मिलकर बना रहे 5 KM सड़क

जिले के टाटीझरिया प्रखंड अंतर्गत बेडम पंचायत के सुदूरवर्ती हेसाकोचा आदिवासी गांव में ग्रामीणों ने सरकारी इंतजार छोड़ खुद विकास की राह बनाने की पहल की है. पिछले पांच दिनों से करीब 25 घरों के 250 आदिवासी ग्रामीण श्रमदान कर जंगल के बीच पांच किलोमीटर लंबे जर्जर रास्ते को दुरुस्त करने में जुटे हैं.

जब सिस्टम ने नहीं सुनी पुकार, तो ग्रामीणों ने खुद उठाया कुदाल-फावड़ा, 250 लोग मिलकर बना रहे 5 KM सड़क

हजारीबाग(hazaribagh): जिले के टाटीझरिया प्रखंड अंतर्गत बेडम पंचायत के सुदूरवर्ती हेसाकोचा आदिवासी गांव में ग्रामीणों ने सरकारी इंतजार छोड़ खुद विकास की राह बनाने की पहल की है. पिछले पांच दिनों से करीब 25 घरों के 250 आदिवासी ग्रामीण श्रमदान कर जंगल के बीच पांच किलोमीटर लंबे जर्जर रास्ते को दुरुस्त करने में जुटे हैं. महिला, पुरुष और युवा हाथों में कुदाल, फावड़ा, गैंता और सब्बल लेकर रास्ते को चलने लायक बना रहे हैं. ग्रामीणों का कहना है कि कई बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से गुहार लगाने के बावजूद सड़क नहीं बनी. बरसात के बाद हर साल उन्हें खुद श्रमदान करना पड़ता है. सड़क के अभाव में गर्भवती महिलाओं और बीमार मरीजों को खाट पर लादकर पांच किलोमीटर तक ले जाना पड़ता है. ग्रामीणों की यह पहल सरकारी व्यवस्था के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर रही है. अब उनकी मांग है कि जल्द पक्की सड़क का निर्माण कराया जाए.

क्या है पूरा मामला

दरअसल, हजारीबाग जिले के टाटीझरिया प्रखंड अंतर्गत बेडम पंचायत के सुदूरवर्ती हेसाकोचा आदिवासी गांव में पिछले पांच दिनों से श्रमदान का अभियान चल रहा है. करीब 25 घरों के 250 ग्रामीण मिलकर जंगल के बीच लगभग पांच किलोमीटर लंबे जर्जर रास्ते को चलने लायक बनाने में जुटे हैं. सुबह होते ही ग्रामीण अपने जरूरी काम छोड़कर रास्ते की मरम्मत में लग जाते हैं. कोई कुदाल से मिट्टी काट रहा है, तो कोई फावड़े और सब्बल की मदद से रास्ता समतल कर रहा है. इस काम में महिलाएं और युवा भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं. ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से सड़क निर्माण की मांग की, लेकिन अब तक उनकी समस्या का समाधान नहीं हुआ. बरसात के बाद हर साल उन्हें खुद ही रास्ते को ठीक करना पड़ता है.

बीमार और जरूरतमंद लोगों को भुगतना पड़ता है खामियाजा

सड़क नहीं होने का सबसे ज्यादा खामियाजा बीमार और जरूरतमंद लोगों को भुगतना पड़ता है. गांव में किसी के बीमार पड़ने या गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाने की नौबत आने पर परिजनों को खाट के सहारे करीब पांच किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है. ऐसे में कई बार समय पर इलाज मिलना भी मुश्किल हो जाता है. ग्रामीणों की यह मेहनत व्यवस्था की जमीनी हकीकत सामने ला रही है. उनका कहना है कि श्रमदान से फिलहाल रास्ता तो बनाया जा सकता है, लेकिन स्थायी समाधान पक्की सड़क बनने से ही होगा. अब ग्रामीणों ने प्रशासन से जल्द सड़क निर्माण कराने की मांग की है.

रिपोर्ट- शशांक शेखर सिंह