उपराजधानी में सड़क नहीं, जिम्मेदारी का गड्ढा! जनता परेशान और विभागों में ‘ये मेरा काम नहीं’ की जंग

संताल परगना का प्रमंडलीय मुख्यालय, झारखंड की उपराजधानी और राजनीतिक रूप से प्रदेश की बेहद अहम धरती है दुमका. इसी शहर के प्रवेश द्वार से गुजरते ही विकास के दावों की चमक सड़क के गड्ढों में कहीं खो जाती है.

उपराजधानी में सड़क नहीं, जिम्मेदारी का गड्ढा! जनता परेशान और विभागों में ‘ये मेरा काम नहीं’ की जंग

DUMKA: संताल परगना का प्रमंडलीय मुख्यालय, झारखंड की उपराजधानी और राजनीतिक रूप से प्रदेश की बेहद अहम धरती है दुमका. इसी शहर के प्रवेश द्वार से गुजरते ही विकास के दावों की चमक सड़क के गड्ढों में कहीं खो जाती है. दुधानी टॉवर चौक से गांधी मैदान होते हुए डीसी चौक की ओर बढ़िए तो सवाल सड़क का कम और जिम्मेदारी का ज्यादा नजर आता है.

उपराजधानी का ‘वेलकम गिफ्ट’ : हिचकोले और जाम

बिहार से पश्चिम बंगाल की ओर जाने वाले वाहन जैसे ही दुमका के महारो चौक पार करते हैं, सड़क के हिचकोले स्वागत करने लगते हैं. दुधानी टॉवर चौक पहुंचते पहुंचते तस्वीर और साफ हो जाती है. गोशाला रोड पर कहीं गड्ढा, कहीं जल भराव और कहीं वाहनों की ऐसी जद्दोजहद कि चालक यह तय करने में उलझ जाए कि बाएं निकलें या दाएं.

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सड़क पर गड्ढे, चालकों के बीच ‘कौन पहले निकले’ की लड़ाई

सड़क की हालत ऐसी कि एक वाहन निकला तो दूसरे को रुकना पड़े. जगह कम और वाहनों की संख्या ज्यादा होने पर मामूली बात भी तकरार में बदल जाती है. सवाल सीधा है, उपराजधानी की मुख्य सड़क पर यातायात का यह हाल आखिर कब तक?

टोटो और स्कूटी के लिए सड़क बनी ‘हादसा जोन’

इस सड़क पर जरा सी चूक भारी पड़ सकती है. टोटो और स्कूटी के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटनाएं सामने आती रहती हैं. कोई गिरता है, कोई घायल होता है, कोई अस्पताल पहुंचता है और व्यवस्था फिर अगले हादसे तक इंतजार करती नजर आती है.

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बारिश में सड़क नहीं, ‘बैतरणी’ पार करती है जनता

बारिश होते ही समस्या और बढ़ जाती है. सड़क पर जमा पानी और गड्ढे मिलकर ऐसा रास्ता बना देते हैं, जिसे पार करना किसी चुनौती से कम नहीं. स्कूल जाने वाले बच्चे हों, आम राहगीर हों या मंदिर जाने वाले श्रद्धालु, सभी इसी रास्ते से गुजरने को मजबूर हैं.

अधिकारी भी इसी सड़क से गुजरते हैं, फर्क सिर्फ गाड़ी का है

दिलचस्प यह है कि इसी रास्ते से अधिकारी और जनप्रतिनिधि भी गुजरते हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या बंद शीशों वाली गाड़ी के भीतर से सड़क का दर्द उतना दिखाई देता है, जितना पैदल चलने वाले को दिखाई देता है?

सड़क किसकी? जवाब के लिए विभागों के दरवाजे खटखटाइए

जानकारों के अनुसार यह सड़क डुमरी से रामपुरहाट तक जाने वाले एनएच-114ए का हिस्सा है. एनएच के एक अधिकारी के अनुसार बासुकीनाथ से दुमका टॉवर चौक तक सड़क निर्माण का टेंडर हुआ है. टॉवर चौक से डीसी चौक की ओर सड़क मरम्मत के संबंध में उन्होंने जिम्मेदारी स्पष्ट करने से असमर्थता जताई.

एनएच कहता है आरसीडी देखे, आरसीडी कहता है एनएच देखे!

दूसरी ओर आरसीडी और नगर परिषद का कहना है कि सड़क एनएच में चली गई है तो रखरखाव की जिम्मेदारी भी एनएच की है. यानी सड़क बीच में फंसी है और जिम्मेदारी इधर से उधर घूम रही है. विभागीय दलीलों के इस खेल में अगर कोई लगातार फंस रहा है तो वह है आम आदमी.

सड़क सुरक्षा समिति की चेतावनी : हादसे से पहले जागिए

सड़क सुरक्षा समिति के सदस्य मनोज घोष का कहना है कि सड़क किसी विभाग की हो, परेशानी जनता को हो रही है. जर्जर सड़क दुर्घटना को आमंत्रण दे रही है. उन्होंने दुर्गापूजा से पहले आपसी समन्वय से सड़क का जीर्णोद्धार कराने की मांग की है.

जामा की छह मौतें क्या चेतावनी कम थीं?

25 अगस्त 2020 को जामा में जर्जर सड़क पर चावल लदा ट्रक कार पर पलट गया था. हादसे में कार सवार छह लोगों की मौके पर ही मौत हो गई थी. मृतकों में दो मासूम और दो महिलाएं भी शामिल थीं. वह हादसा सिर्फ एक खबर नहीं था, बल्कि सड़क की बदहाली की कीमत का भयावह उदाहरण था.

अगला हादसा होने तक फाइल चलेगी या सड़क?

अब सवाल गोशाला रोड का है. क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही विभाग जागेगा? क्या मरम्मत से पहले जिम्मेदारी तय करने की कवायद चलती रहेगी? और अगर कल कोई बड़ा हादसा होता है तो जिम्मेदारी किसकी होगी, एनएच, आरसीडी, नगर परिषद या फिर हमेशा की तरह किसी जांच के बाद जिम्मेदारी तय करने का आश्वासन?

दुमका उपराजधानी है.झारखंड की राजनीति में रसूख रखने वाले सोरेन परिवार की कर्म भूमि है. वर्तमान में सीएम हेमंत सोरेन के छोटे भाई बसंत सोरेन यहां के विधायक है, जिन्होंने चुनाव जीतने के साथ ही दुमका को उपराजधानी की तरह सजाने और संवारने का वादा किया था. लेकिन गोशाला रोड देखकर सवाल उठता है कि यहां विकास की सड़क चल रही है या जिम्मेदारी से बचने की दौड़?

रिपोर्ट: पंचम झा