दुमका: शिक्षा के मंदिर के बाहर गंदगी का साम्राज्य, बदबू के बीच पढ़ने को मजबूर छात्राएं

स्कूल को शिक्षा का मंदिर कहा जाता है, जहां बच्चों को स्वच्छता, अनुशासन और बेहतर नागरिक बनने का पाठ पढ़ाया जाता है. लेकिन दुमका शहर के मारवाड़ी बालिका उच्च विद्यालय के बाहर पसरी गंदगी व्यवस्था के दावों पर सवाल खड़े कर रही है.

दुमका: शिक्षा के मंदिर के बाहर गंदगी का साम्राज्य, बदबू के बीच पढ़ने को मजबूर छात्राएं

दुमका (DUMKA): स्कूल को शिक्षा का मंदिर कहा जाता है, जहां बच्चों को स्वच्छता, अनुशासन और बेहतर नागरिक बनने का पाठ पढ़ाया जाता है. लेकिन दुमका शहर के मारवाड़ी बालिका उच्च विद्यालय के बाहर पसरी गंदगी व्यवस्था के दावों पर सवाल खड़े कर रही है. विद्यालय के बाहर गंदगी के साथ मृत पशुओं के अवशेष पड़े होने की बात सामने आ रही है. दुर्गंध ऐसी कि छात्राओं को नाक बंद कर विद्यालय में प्रवेश करना पड़ता है. सवाल यह है कि जिस रास्ते से बेटियां हर दिन शिक्षा के मंदिर तक पहुंचती हैं, उसे साफ रखना आखिर किसकी जिम्मेदारी है?

किताबों के साथ दुर्गंध से भी जूझ रहीं छात्राएं

विद्यालय में पढ़ने आने वाली छात्राओं के सामने पढ़ाई से पहले ही एक अलग चुनौती खड़ी हो जाती है. विद्यालय प्रबंधन के अनुसार बाहर की गंदगी और दुर्गंध का असर कक्षाओं तक महसूस होता है. स्थिति यह है कि छात्राओं को परेशानी होने और कक्षा में उल्टी की शिकायत के बाद घर भेजने तक की नौबत आती है. यदि यह स्थिति लगातार बनी हुई है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि छात्राओं के स्वास्थ्य और पढ़ाई के इस माहौल को बेहतर बनाने के लिए अब तक प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए गए?

पत्राचार हुआ, लेकिन सफाई जमीन पर कब दिखेगी?

विद्यालय की प्रधानाध्यापिका श्रीति झा का कहना है कि विभाग के वरीय पदाधिकारी के पत्र के आलोक में नगर परिषद से पत्राचार किया गया है. इसके बावजूद समस्या का समाधान नहीं हो पाया है. ऐसे में सवाल है कि जब संबंधित अधिकारियों तक मामला पहुंच चुका है, तो सफाई की ठोस व्यवस्था कब होगी? क्या सरकारी व्यवस्था में पत्राचार पूरा हो जाना ही पर्याप्त है या उसका असर जमीन पर भी दिखना चाहिए?

मृत पशुओं के अवशेष और दुर्गंध जैसी स्थिति सामने आने पर त्वरित सफाई की अपेक्षा स्वाभाविक है. आखिर ऐसी समस्या के समाधान के लिए कितने पत्रों और कितनी प्रतीक्षा की जरूरत है? जब गंदगी आंखों के सामने है, तो कार्रवाई के लिए व्यवस्था को किस संकेत का इंतजार है?

फाइलों की यात्रा लंबी, सफाई की गाड़ी का रास्ता इतना मुश्किल क्यों?

सरकारी कामकाज में पत्राचार और निर्देशों की अपनी अहमियत है, लेकिन आम लोगों को राहत तभी मिलती है, जब उनका परिणाम धरातल पर दिखाई देता है. विद्यालय के बाहर की समस्या किसी बंद कमरे में नहीं, खुले में मौजूद है. फिर भी समाधान का इंतजार बना हुआ है. सवाल यही है कि जिस गंदगी को देखकर समस्या समझी जा सकती है, उसे हटाने के लिए क्या अब भी फाइलों के आगे बढ़ने का इंतजार करना होगा?

उपराजधानी की पहचान सिर्फ दर्जे से नहीं, बुनियादी सुविधाओं से भी

दुमका को झारखंड की उपराजधानी कहा जाता है. शहर के बीच स्थित मारवाड़ी बालिका उच्च विद्यालय के बाहर इस तरह की स्थिति बने रहना की नगर की बुनियादी सुविधाओं पर सवाल खड़ा करता है. छात्राओं को नाक बंद कर विद्यालय में प्रवेश करना पड़े और दुर्गंध कक्षाओं तक पहुंचे, तो स्वच्छता के दावों की वास्तविक स्थिति पर चर्चा होना लाजिमी है.

उपराजधानी की पहचान केवल सरकारी दर्जे और इमारतों से नहीं बनती. शहर की साफ सफाई, नागरिक सुविधाएं और बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण भी उसकी पहचान का हिस्सा हैं. ऐसे में सवाल है कि विद्यालय के आसपास नियमित सफाई सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निभाने में आखिर बाधा कहां है?

इंदौर बनाने का दावा, स्कूल के बाहर की गंदगी से परीक्षा

कुछ महीने पहले हुए नगर निकाय चुनाव के बाद नवनिर्वाचित नगर परिषद अध्यक्ष अभिषेक चौरसिया ने दुमका को स्वच्छता के मामले में इंदौर जैसा बनाने का दावा किया था. लेकिन मारवाड़ी बालिका उच्च विद्यालय के बाहर की स्थिति उस दावे की कसौटी बनकर सामने आ रही है. सवाल किसी शहर से तुलना करने भर का नहीं, बल्कि बुनियादी सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करने का है.

यदि शहर को स्वच्छ बनाने का लक्ष्य है, तो इसकी शुरुआत उन स्थानों से क्यों नहीं होनी चाहिए, जहां हर दिन बड़ी संख्या में छात्राएं पहुंचती हैं? क्या विद्यालय के आसपास सफाई सुनिश्चित करना भी नगर परिषद की प्राथमिकताओं में शामिल है? यदि हां, तो समस्या का समाधान अब तक क्यों नहीं दिख रहा?

जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की नजर कब पड़ेगी?

जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा होती है कि वे आम नागरिकों की समस्याओं को संबंधित विभागों तक पहुंचाएं और समाधान की पहल करें. ऐसे में यह सवाल भी प्रासंगिक है कि क्या संबंधित जनप्रतिनिधियों को विद्यालय के बाहर की स्थिति की जानकारी है? यदि है, तो समस्या के समाधान के लिए क्या पहल की गई है? और यदि जानकारी नहीं है, तो क्या अब इस ओर ध्यान दिया जाएगा?

जिला प्रशासन की भूमिका भी महत्वपूर्ण है. स्वच्छता को लेकर बैठकें, निर्देश और अभियान तभी प्रभावी माने जाएंगे, जब उनका असर सड़कों और सार्वजनिक स्थलों पर दिखाई दे. ऐसे में प्रशासन से भी सवाल है कि विद्यालय के आसपास सफाई की निगरानी कैसे होती है? यदि नियमित निगरानी की व्यवस्था है, तो इस स्थिति पर कार्रवाई कब होगी?

स्वच्छता अभियान की असली परीक्षा जमीन पर

गांधी जयंती पर स्वच्छता के संकल्प और अभियानों की चर्चा होती है. जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं. लेकिन स्वच्छता का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होता है, जब लोगों को अपने रोजमर्रा के जीवन में उसका लाभ मिले. मारवाड़ी बालिका उच्च विद्यालय के बाहर की स्थिति इसी बुनियादी सवाल को सामने लाती है. क्या स्वच्छता के संकल्प को इस विद्यालय के बाहर नियमित सफाई के रूप में भी देखा जा सकेगा या अभियान की बातें कार्यक्रमों तक ही सीमित रह जाएंगी?

बेटियों को स्वच्छ रास्ता चाहिए, आश्वासन नहीं

सरकार बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा देती है. बेटियों की शिक्षा और सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही जाती है. लेकिन पढ़ाई के लिए विद्यालय पहुंचने वाली छात्राओं को यदि गंदगी और दुर्गंध से जूझना पड़े, तो उनके लिए स्वच्छ वातावरण सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी हो जाता है. विद्यालय प्रबंधन अपनी ओर से पत्राचार किए जाने की बात कह रहा है. अब जरूरत इस बात की है कि संबंधित विभाग समस्या का संज्ञान लेकर नियमित सफाई की व्यवस्था सुनिश्चित करें.

यह मामला केवल एक विद्यालय के बाहर जमा गंदगी का नहीं, बल्कि छात्राओं के स्वास्थ्य, पढ़ाई के माहौल और नागरिक सुविधाओं से जुड़ा है. अब सवाल यह नहीं कि पत्र किसे लिखा गया, बल्कि यह है कि नियमित सफाई कब से होगी और ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए क्या व्यवस्था की जाएगी?

दुमका का सीधा सवाल : दावे अपनी जगह, सफाई कब?

मारवाड़ी बालिका उच्च विद्यालय के बाहर की स्थिति ने एक बार फिर व्यवस्था की जवाबदेही को कटघरे में खड़ा किया है. क्या शिक्षा के मंदिर तक पहुंचने वाला रास्ता स्वच्छ रखना इतना मुश्किल है? क्या छात्राओं की परेशानी दूर करने के लिए भी किसी बड़े आदेश का इंतजार करना पड़ेगा? और क्या उपराजधानी में एक बालिका विद्यालय के आसपास नियमित सफाई सुनिश्चित नहीं की जा सकती?

इन सवालों का जवाब भाषणों, बैठकों और पत्राचार में नहीं, बल्कि विद्यालय के बाहर साफ सुथरे रास्ते और नियमित सफाई की व्यवस्था में दिखाई देना चाहिए. क्योंकि बेटियां पढ़ने विद्यालय आती हैं, व्यवस्था की लापरवाही का बोझ उठाने नहीं.

रिपोर्ट : पंचम झा