दुमका: निरीक्षण करते रहे सीएस, जलती रहीं एक्सपायरी दवाएं, सीएचसी प्रभारी का आया अजूबा बयान
सरकारी अस्पतालों में मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने और सरकार की योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक पहुंचाने के लिए स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी समय समय पर निरीक्षण करते हैं
Dumka: सरकारी अस्पतालों में मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने और सरकार की योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक पहुंचाने के लिए स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी समय समय पर निरीक्षण करते हैं. लेकिन जब अधिकारियों के निरीक्षण के दौरान ही अस्पताल परिसर में नियमों की अनदेखी होती रहे तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है. ऐसा ही मामला दुमका जिले के रानीश्वर प्रखंड स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में सामने आया है. मंगलवार को सिविल सर्जन डॉ सुशांतो मांझी सीएचसी रानीश्वर का निरीक्षण करने पहुंचे थे. वे स्वास्थ्यकर्मियों के साथ बैठक कर बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने और सरकारी योजनाओं का लाभ आम लोगों तक पहुंचाने की नसीहत दे रहे थे, वहीं दूसरी ओर अस्पताल परिसर में एक्सपायरी दवाओं को आग के हवाले किए जाने का मामला सामने आया. अस्पताल परिसर में धुआं उठता रहा, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि निरीक्षण के दौरान सिविल सर्जन को इसकी भनक तक नहीं लगी. या यूं कहें कि सीएचसी प्रबंधन की गतिविधियां उनकी नजरों से ओझल रहीं. जब इस संबंध में सिविल सर्जन से सवाल किया गया तो उन्होंने दवाएं जलाए जाने की जानकारी से अनभिज्ञता जताई और स्पष्ट कहा कि किसी भी परिस्थिति में एक्सपायरी दवाओं को जलाया नहीं जा सकता.

दवा की जरूरत मरीजों को थी या सप्लाई का आंकड़ा बढ़ाने की?
सरकारी अस्पतालों में दवाओं की उपलब्धता जरूरी है, लेकिन जरूरत से अधिक दवाओं की खरीद और आपूर्ति भी सरकारी धन की बर्बादी का कारण बन सकती है. यदि किसी स्वास्थ्य केंद्र को आवश्यकता से अधिक दवाएं भेजी जाती हैं और उनका इस्तेमाल नहीं हो पाता तो वे अंततः एक्सपायर होकर बेकार हो जाती हैं. रानीश्वर सीएचसी में भारी मात्रा में एक्सपायरी दवाओं का मामला सामने आने के बाद यही सवाल उठ रहा है कि आखिर दवाओं की मांग और वास्तविक खपत का आकलन किस आधार पर किया जाता है? क्या सप्लाई से पहले अस्पताल में उपलब्ध पुराने स्टॉक की जानकारी ली जाती है? इस संबंध में सीएचसी प्रभारी डॉ एन मंडल से पूछे जाने पर वह सही आंकड़ा प्रस्तुत करने में असमर्थ रहे. ऐसे में सवाल है कि जिस अस्पताल में दवाओं की खरीद, उपलब्धता और खपत का हिसाब होना चाहिए, वहां प्रभारी के पास ही सटीक आंकड़ा क्यों नहीं है?

कहीं कमीशन के खेल में तो नहीं बढ़ाई जाती दवाओं की मांग?
रानीश्वर सीएचसी में एक्सपायरी दवाओं का मामला केवल लापरवाही तक सीमित नहीं है. यह दवाओं की खरीद, आपूर्ति और वितरण की पूरी व्यवस्था की जांच की मांग करता है. आखिर इतनी दवाएं एक्सपायर कैसे हो गईं? क्या अस्पताल की वास्तविक जरूरत से अधिक दवाओं की मांग की गई थी? क्या जरूरत से अधिक दवाओं की आपूर्ति हुई? दवाओं की खरीद और सप्लाई में शामिल अधिकारियों तथा एजेंसियों की जवाबदेही क्या है? कहीं खरीद और आपूर्ति की प्रक्रिया में कमीशनखोरी का कोई खेल तो नहीं चल रहा? बेशक, फिलहाल कमीशनखोरी का कोई प्रमाण सामने नहीं आया है, लेकिन इन आशंकाओं को दूर करने के लिए निष्पक्ष जांच जरूरी है. दवाओं की मांग से लेकर खरीद और आपूर्ति तक के रिकॉर्ड की जांच होनी चाहिए, ताकि सरकारी धन के इस्तेमाल की वास्तविक तस्वीर सामने आ सके.

एक्सपायरी दवाओं का ढेर, सरकारी धन की बर्बादी का हिसाब कौन देगा?
सरकारी दवाएं जनता के पैसे से खरीदी जाती हैं. उनका उद्देश्य मरीजों को मुफ्त इलाज उपलब्ध कराना है, न कि अस्पतालों के स्टोर में रखे रखे उनकी उपयोग अवधि समाप्त होने देना. एक तरफ ग्रामीण क्षेत्रों के मरीज कई बार जरूरी दवाओं के लिए भटकते हैं, वहीं दूसरी तरफ स्वास्थ्य केंद्रों में दवाएं एक्सपायर होकर नष्ट किए जाने की नौबत आ रही है. यह विरोधाभास स्वास्थ्य विभाग की दवा प्रबंधन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है. आखिर जिन दवाओं से मरीजों का इलाज होना था, वे मरीजों तक पहुंचने के बजाय एक्सपायर कैसे हो गईं? क्या इन दवाओं का समय रहते वितरण नहीं किया जा सकता था? क्या स्टॉक की नियमित समीक्षा होती थी? इन सवालों का जवाब विभाग को देना चाहिए.
प्रभारी का अजूबा बयान, बोले- दवाएं नहीं, सिर्फ रैपर जले थे!
इस पूरे मामले में सीएचसी प्रभारी का जवाब भी कम दिलचस्प नहीं है. उन्होंने दवाएं जलाए जाने की बात से इनकार करते हुए कहा कि वहां दवाएं नहीं, बल्कि दवाओं के रैपर जले थे. कुछ कचरा डस्टबिन का था तो कुछ रैपर असामाजिक तत्व बाहर से लाकर जला गए थे. अब सवाल यह है कि यदि अस्पताल परिसर में असामाजिक तत्व आकर इस तरह कचरा और दवाओं के रैपर जला रहे थे तो अस्पताल प्रबंधन ने उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की? क्या इसकी सूचना पुलिस को दी गई? क्या अस्पताल परिसर की सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर है कि कोई भी व्यक्ति आकर वहां आग लगा सकता है? प्रभारी के इस स्पष्टीकरण ने मामले को शांत करने के बजाय नए सवाल खड़े कर दिए हैं.

जांच टीम के पहुंचने से पहले घटनास्थल की सफाई, आखिर किस बात की थी जल्दबाजी?
मामले को गंभीरता से लेते हुए सिविल सर्जन ने बुधवार को मोबाइल पर बातचीत के दौरान बताया कि घटना की जांच की जा रही है. जांच के लिए एक टीम का गठन किया गया है. बुधवार को टीम जांच के लिए रानीश्वर सीएचसी पहुंची, लेकिन तब तक जिस स्थान पर दवाएं जलाए जाने की बात सामने आई थी, वहां बेहतर तरीके से साफ सफाई कर दी गई थी. एक तरफ प्रभारी का दावा है कि वहां सिर्फ दवाओं के रैपर और डस्टबिन का कचरा जलाया गया था, वहीं दूसरी तरफ जांच टीम के पहुंचने से पहले ही घटनास्थल की सफाई हो जाना कई सवाल खड़े करता है. यदि दिवाली के मद्देनजर सामान्य साफ सफाई की जा रही थी तो फिर पूरे अस्पताल परिसर की सफाई होनी चाहिए थी. सवाल यह है कि सफाई केवल उसी स्थान पर क्यों की गई, जहां दवाएं जलाए जाने का मामला सामने आया था? क्या यह सामान्य सफाई थी या फिर जांच से पहले घटनास्थल को साफ करने की कोई जल्दबाजी?
अब जांच की आंच खरीद और सप्लाई तक पहुंचेगी या मामला ठंडे बस्ते में जाएगा?
सिविल सर्जन के निरीक्षण से लेकर प्रभारी के बयान और जांच टीम के पहुंचने से पहले घटनास्थल की सफाई तक, पूरा मामला कई अनुत्तरित सवाल छोड़ रहा है. अब विभाग के सामने केवल यह पता लगाने की चुनौती नहीं है कि वहां दवाएं जलाई गई थीं या उनके रैपर, बल्कि यह भी जांचना जरूरी है कि एक्सपायरी दवाएं कितनी थीं, वे कब एक्सपायर हुईं और उनके निस्तारण की जिम्मेदारी किसकी थी. इसके साथ ही दवाओं की खरीद, आपूर्ति, भंडारण और वितरण के रिकॉर्ड की भी जांच होनी चाहिए. यदि जरूरत से अधिक दवाओं की आपूर्ति हुई है तो उसके पीछे की वजह भी सामने आनी चाहिए. सवाल यह है कि क्या जांच की आंच केवल सीएचसी परिसर तक सीमित रहेगी या दवाओं की खरीद और सप्लाई से जुड़े पूरे तंत्र तक पहुंचेगी? फिलहाल रानीश्वर सीएचसी में उठे धुएं के साथ स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही पर भी कई सवाल तैर रहे हैं.