दुमका में 'ऑपरेशन दूधानी' पर उठे बड़े सवाल, पंकज की तलाश थी, तो विवेक राउत के घर पुलिस की दबिश क्यों ?

दुमका में 'ऑपरेशन दूधानी' पर उठे बड़े सवाल, पंकज की तलाश थी, तो विवेक राउत के घर पुलिस की दबिश क्यों ?

दुमका. शनिवार की सुबह दुमका जिले के दूधानी गांव में जो कुछ हुआ, उसने केवल एक पुलिस कार्रवाई को नहीं बल्कि प्रशासनिक कार्यशैली, कानूनी प्रक्रिया और राजनीतिक समीकरणों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. पुलिस और वन विभाग के अधिकारियों की बड़ी टीम अचानक उस घर पर पहुंची, जिसे दुमका ही नहीं बल्कि पूरे संथाल परगना की राजनीति में एक प्रभावशाली पहचान रखने वाले विवेक राउत का आवास माना जाता है. अधिकारियों का कहना था कि वे पंकज राउत की तलाश में आए हैं. लेकिन जिस तरीके से कार्रवाई हुई, उसने स्थानीय लोगों को हैरान कर दिया.सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि पुलिस केवल पंकज राउत को तलाश रही थी, तो विवेक राउत के घर को इतनी बड़ी संख्या में पुलिस बल के साथ घेरने की आवश्यकता क्यों पड़ी.

कौन हैं विवेक राउत, जिनके घर पहुंची पुलिस.

पूरे मामले को समझने के लिए विवेक राउत की राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है. दुमका की राजनीति में विवेक राउत कोई सामान्य व्यक्ति नहीं माने जाते. वे झारखंड आंदोलन के शीर्ष नेता और झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक स्वर्गीय गुरुजी शिबू सोरेन के बेहद करीबी सहयोगियों में रहे हैं. लंबे समय तक उन्होंने उनके आप्त सचिव के रूप में कार्य किया. राजनीतिक गलियारों में उन्हें सोरेन परिवार के विश्वस्त लोगों में गिना जाता रहा है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सहित सोरेन परिवार के अन्य सदस्यों से भी उनकी निकटता किसी से छिपी नहीं मानी जाती. दुमका में प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में उनकी पहचान व्यापक है.यही कारण है कि स्थानीय लोगों के लिए यह विश्वास करना कठिन था कि इतनी बड़ी पुलिस कार्रवाई उनके आवास पर होगी. गांव में चर्चा थी कि यदि पुलिस को केवल पंकज राउत से पूछताछ करनी थी तो पहले विवेक राउत से संपर्क किया जा सकता था.

सुबह-सुबह गांव में पहुंची पुलिस. माहौल बना छावनी जैसा.

शनिवार सुबह पुलिस और वन विभाग की कई गाड़ियां दूधानी गांव पहुंचीं. देखते ही देखते बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी विवेक राउत के घर के बाहर तैनात हो गए. ग्रामीणों का कहना है कि कार्रवाई का स्वरूप ऐसा था, मानो किसी बड़े अपराधी या नक्सली के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा हो. पुलिस की भारी मौजूदगी देखकर आसपास के लोग भी मौके पर पहुंचने लगे. कुछ ही देर में वहां बड़ी संख्या में ग्रामीण इकट्ठा हो गए और पुलिस से कार्रवाई का कारण पूछने लगे.

पुलिस ने कहा. पंकज की तलाश है.

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार अधिकारियों ने बताया कि वे पंकज राउत की तलाश में आए हैं. पंकज, विवेक राउत के रिश्तेदार बताए जाते हैं और उनका घर आना-जाना रहता है. हालांकि ग्रामीणों का कहना था कि केवल किसी रिश्तेदार के आने-जाने के आधार पर पूरे घर को घेर लेना कई सवाल खड़े करता है.

वारंट कहां है. ग्रामीणों ने पूछा.

मौके पर मौजूद ग्रामीणों ने पुलिस अधिकारियों से पूछा कि क्या उनके पास गिरफ्तारी वारंट है. क्या घर की तलाशी लेने का कोई सर्च वारंट है. प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि मौजूद प्रशिक्षु अधिकारी ने कहा कि उनके पास ऐसा कोई लिखित आदेश नहीं है, लेकिन वे कार्रवाई करने में सक्षम हैं.यहीं से पूरे घटनाक्रम पर सवाल और गहरे होने लगे.

जिला परिषद प्रतिनिधि और शिक्षक ने भी उठाए सवाल.

घटना की जानकारी मिलने पर जिला परिषद प्रतिनिधि चिंता देवी भी मौके पर पहुंचीं. उन्होंने अधिकारियों से पूछा कि यदि कोई लिखित आदेश नहीं है तो तलाशी किस कानूनी प्रावधान के तहत ली जा रही है.स्थानीय शिक्षक अशोक कुमार ने भी पूछा कि आखिर पंकज राउत के खिलाफ मामला क्या है. यदि कोई अपराध हुआ है तो पुलिस सार्वजनिक रूप से बताए. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार इन सवालों का कोई स्पष्ट उत्तर मौके पर नहीं दिया गया.

तलाशी हुई. लेकिन बरामद क्या हुआ.

ग्रामीणों के अनुसार पुलिस ने पूरे घर की तलाशी ली. लेकिन कोई आपत्तिजनक सामग्री बरामद होने की जानकारी सामने नहीं आई. जब लोगों ने पूछा कि आखिर मिला क्या, तो अधिकारियों ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया और वहां से चले गए.

स्थानीय लोगों के बयान ने बढ़ाए सवाल.

घटना के बाद कई स्थानीय लोगों ने पुलिस कार्रवाई की शैली पर सवाल उठाए.

एक ग्रामीण ने कहा.

"पंकज राउत एक नेक इंसान हैं. अगर उन्होंने कोई अपराध किया है तो पुलिस बताए. लेकिन जिस तरह इतनी बड़ी संख्या में पुलिस पहुंची, उससे ऐसा लग रहा था जैसे किसी नक्सली के खिलाफ ऑपरेशन चल रहा हो."

दूसरे ग्रामीण ने कहा.

"अगर पंकज को ढूंढना था तो पहले विवेक बाबू से बात की जा सकती थी. पूरे गांव में डर का माहौल बनाने की जरूरत क्या थी."

एक अन्य ग्रामीण ने कहा.

"दुमका में कौन अधिकारी है जो विवेक राउत को नहीं जानता."

ये सभी स्थानीय लोगों के बयान हैं. इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है. भीड़ में सत्ता और रसूख की चर्चा.

घटना के दौरान भीड़ में कई तरह की चर्चाएं सुनाई देती रहीं.

कोई कह रहा था.

"पंकज को ढूंढना था तो पहले विवेक बाबू को फोन कर लेते."

एक अन्य व्यक्ति ने कहा.

"दुमका में ऐसा कौन अधिकारी है जो विवेक राउत को नहीं जानता."

कुछ लोग यह भी कहते सुनाई दिए कि विवेक राउत का प्रशासनिक हलकों में अच्छा प्रभाव माना जाता है. यहां तक कि कुछ लोगों ने अधिकारियों की पोस्टिंग को लेकर भी उनकी भूमिका होने का दावा किया.

हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इनके समर्थन में कोई आधिकारिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है. इसलिए इन्हें केवल स्थानीय चर्चा के रूप में ही देखा जाना चाहिए.

झामुमो जिला अध्यक्ष भी पहुंचे.

कार्रवाई के दौरान झारखंड मुक्ति मोर्चा के जिला अध्यक्ष भी मौके पर पहुंचे. स्थानीय लोगों के अनुसार उन्होंने कहा कि उन्हें "बसंत भैया" ने यह देखने भेजा है कि आखिर वहां क्या हो रहा है.

इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान उपलब्ध नहीं है.

RTI कनेक्शन ने बढ़ाई हलचल.

पुलिस कार्रवाई के कुछ समय बाद सोशल मीडिया पर पंकज कुमार द्वारा दायर कई RTI आवेदन वायरल होने लगे. उपलब्ध दस्तावेजों से पता चलता है कि उन्होंने वन विभाग और जिला प्रशासन से मसानजोर डैम में नौका विहार, पार्क निर्माण, बालू आपूर्ति, सरकारी वाहनों के उपयोग और अन्य सरकारी कार्यों से जुड़ी जानकारी मांगी थी. अपलोड किए गए दस्तावेजों में RTI आवेदन, प्रथम अपील, डाक रसीदें और संबंधित कागजात शामिल हैं. हालांकि अभी तक ऐसा कोई आधिकारिक दस्तावेज सामने नहीं आया है जिससे यह साबित हो कि पुलिस कार्रवाई का सीधा संबंध इन RTI आवेदनों से था.

सबसे बड़ा सवाल.

पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि पुलिस पंकज राउत को क्यों तलाश रही थी. सबसे बड़ा सवाल यह है कि.

  • क्या पुलिस के पास तलाशी का वैध आदेश था.
  • क्या विवेक राउत को पहले सूचना दी गई थी.
  • क्या पुलिस को पहले से पता था कि यह विवेक राउत का आवास है.
  • यदि केवल पंकज की तलाश थी तो इतनी बड़ी पुलिस फोर्स क्यों लगाई गई.
  • तलाशी में यदि कुछ नहीं मिला तो कार्रवाई का उद्देश्य क्या था.
  • क्या पुलिस इस पूरे अभियान का आधिकारिक विवरण सार्वजनिक करेगी.

निष्पक्ष जांच और आधिकारिक जवाब जरूरी.

यह मामला अब केवल एक पुलिस रेड तक सीमित नहीं रह गया है. इसने प्रशासनिक पारदर्शिता, पुलिस प्रक्रिया और नागरिक अधिकारों पर बहस छेड़ दी है. पुलिस और वन विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना बेहद जरूरी है. यदि किसी प्राथमिकी, न्यायालय के आदेश या किसी विशेष खुफिया सूचना के आधार पर यह कार्रवाई की गई थी तो उसका विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि फैल रही अटकलों पर विराम लग सके.

जब तक पुलिस, वन विभाग और संबंधित अधिकारी इस कार्रवाई पर विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं देते, तब तक यह मामला दुमका में चर्चा का विषय बना रहेगा.