जवाहरलाल नेहरू की "ड्रीम सिंदरी" में लगभग 4000 आवास कब्जाधारियों के पास, नई आवास नीति क्यों सवालों में ?

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की "ड्रीम सिंदरी" में लगभग 4000 आवास कब्जाधारियों के पास हैं. इनमें गरीबी रेखा के नीचे के लोग भी हैं, तो एफसीआईएल से रिटायर्ड अथवा वीआरएस लिए लोग भी शामिल है. प्रबंधन ने जो 650 रुपया प्रति वर्ग फीट दर निर्धारित किया है, उसको लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं.

जवाहरलाल नेहरू की "ड्रीम सिंदरी" में लगभग 4000 आवास कब्जाधारियों के पास, नई आवास नीति क्यों सवालों में ?

धनबाद(DHANBAD) : देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की "ड्रीम सिंदरी" में लगभग 4000 आवास कब्जाधारियों के पास हैं.  इनमें  गरीबी रेखा के नीचे के लोग भी हैं, तो एफसीआईएल से रिटायर्ड अथवा वीआरएस  लिए लोग भी शामिल है.  प्रबंधन ने जो 650 रुपया प्रति वर्ग फीट दर  निर्धारित किया है, उसको लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं.  कहा जा रहा है कि 80% कब्जाधारी की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है, जो 6.50 रुपए प्रति वर्ग फुट की दर से भुगतान कर सकें।  प्रबंधन ने  आई एम टाइप तथा एफ ,डी और सी टाइप आवासों के लिए एक ही दर  निर्धारित किया है.  ऐसा कैसे संभव हो सकता है कि आवासों के हर वर्गीकरण की दर  एक ही निर्धारित  हो.  

यह  बात सच है कि प्रबंधन से लोग लगातार अपील कर रहे हैं कि अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे.  लोगों का यह भी कहना है की पूरी तरह से व्यावसायिक नजरिया नहीं रखना चाहिए।  जमीन पर सर्वे करने के बाद दर निर्धारित होना चाहिए। उल्लेखनीय  है कि एफसीआईएल प्रबंधन ने  सिंदरी के सरकारी आवासों में कब्जाधारी के रूप में रह रहे लोगों के लिए नई आवास नीति की घोषणा की है.  इसके तहत कब्जाधारियों को नियम के दायरे में लाकर किराए पर आवास आवंटित  करने का प्रावधान किया गया है.  नई व्यवस्था 1 अगस्त से प्रभावी की गई है.   

अधिकृत सूचना के अनुसार अनाधिकृत रूप से रह रहे लोग आवास के निर्धारित चौहद्दी पर 6.50 रुपए प्रति वर्ग फीट की दर से किराया दे सकते हैं.  उन्हें अगस्त का किराया 31 अगस्त तक हर हाल में जमा करना होगा और आगे के महीना का किराया प्रत्येक महीने के 7 तारीख तक जमा करना होगा।  इसके अलावे जो कब्जाधारी "लीव एंड लाइसेंस एग्रीमेंट" के आधार पर आवास अपने नाम आवंटित करना चाहते हैं ,उन्हें भी 6 .50   रुपए प्रति वर्ग फीट की दर से 11 महीने का अग्रिम किराया जमा करना होगा।  इसके साथ ही 2 महीने का किराया ब्याज मुक्त सिक्योरिटी डिपॉजिट के रूप में जमा करनी होगी।

बता दें कि  देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की "ड्रीम सिंदरी" एक बार फिर चर्चे में है.   इस बार कब्जाधारियों के लिए नई आवास नीति को लेकर यह  शहर चर्चा में है.  सिंदरी खाद कारखाना को आज से 24 साल पहले स्थाई रूप से बंद कर दिया गया था.  वैकल्पिक कंपनी खोली गई है, लेकिन सिंदरी खाद कारखाने वाली बात नहीं है. उल्लेखनीय है कि  देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की "स्वप्न सुंदरी" सिंदरी 1951 में शुरू होने के बाद किस्तों में मरती चली गई या किस्तों में मार दी गई.  दोनों बातें सच है, क्योंकि जिस तामझाम और जरूरत को पूरा करने के लिए सिंदरी खाद कारखाने का उद्घाटन पंडित नेहरू ने 1951 में किया था, उसे आगे के दिनों में मेंटेन नहीं किया गया और धीरे-धीरे अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, लालफीताशाही ,नेतागिरी की भेंट चढ गया देश का प्रतिष्ठित सिंदरी खाद कारखाना.  

 यूं तो इसकी हालत एक दशक से भी अधिक समय से बिगड़ रही थी लेकिन अंततः दिसंबर 2002 में इस कारखाने को स्थाई रूप से बंद घोषित कर दिया गया.  यह  कारखाना अपने आप में अद्भुत था, इस कारखाने के पास अपनी रेल लाइन, अपना पोस्ट ऑफिस, अपना एयरपोर्ट सब कुछ था और देश के अन्य उद्योगों के लिए एक उदाहरण भी था.  लेकिन समय के साथ सरकार की निगाहें टेढ़ी होती  गई  और यह कारखाना हमेशा -हमेशा के लिए बंद हो गया.  जिस समय यह कारखाना बंद हुआ ,उस समय यहां कार्यरत कर्मचारियों की संख्या लगभग दो हजार से भी अधिक थी.  उन्हें वीआरएस दे दिया गया 

 इस कारखाने के बंदी के बाद खुलवाने के लिए जबरदस्त आंदोलन हुआ ,धरना -प्रदर्शन हुए, सिंदरी  से लेकर धनबाद तक ,धनबाद से लेकर दिल्ली तक आंदोलन हुए, प्रभावित कर्मचारियों ने जनप्रतिनिधियों से भी गुहार की लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला और कारखाना बंद हो गया.  जो कर्मचारी वीआरएस लेने के बाद भी सिंदरी  छोड़कर नहीं जाना चाहते थे ,उन्हें इकरारनामा के आधार पर जिन घरों में वह रह रहे थे ,आवंटित किया गया.  हालांकि उसके बाद भी उनकी समस्याएं कमी नहीं, समस्याएं बढ़ती रही.  कभी पानी का संकट तो कभी बिजली संकट तो कभी स्वास्थ्य की समस्याएं.  खाद कारखाने का बेहतरीन अस्पताल खंडहर में बदल गया, उस अस्पताल को न सरकार ने टेकओवर किया और ना चलाने की कभी मंशा जाहिर की.  नतीजा हुआ कि करोड़ों -अरबों की अत्याधुनिक मशीनें जंग की भेंट चढ़ गई.