बीसीसीएल चिकित्सा रेफरल व्यवस्था क्यों सवालों में? क्यों कहा जा रहा है कि अगर जांच हो जाये तो कई जाएंगे जेल?
बीसीसीएल की चिकित्सा रेफरल व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं. धनबाद के दयाल कुमार साव ने रेफरल नीति की समीक्षा और हस्तक्षेप की मांग की है.
धनबाद(DHANBAD): बीसीसीएल की चिकित्सा रेफरल व्यवस्था सवालों में घिर गई है. व्यवस्था की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं. लगातार पत्राचार किया जा रहा है. कोल इंडिया तक को पत्र लिखा जा रहा है, लेकिन व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हो रहा है. धनबाद के रहने वाले दयाल कुमार साव ने इसी महीने 9 तारीख को बीसीसीएल के बोर्ड आफ डायरेक्टर के अध्यक्ष को पत्र लिखकर रेफरल नीति की समीक्षा करने तथा हस्तक्षेप की मांग की है. पत्र में कहा गया है कि सेवानिवृत कर्मचारी अपनी चिकित्सा के लिए अपनी पसंद के अस्पतालों का चुनाव करते हैं, लेकिन कार्यरत कर्मचारियों को भी इलाज के लिए रेफर करते समय कई प्रकार के दबाव का सामना करना पड़ता है . वह प्रशासनिक बाध्यताओं के कारण विरोध नहीं कर पाते। जिसका नतीजा है कि उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है.
रिटायर्ड और सेवारत कर्मचारियों की सुविधा में अंतर क्यों ?
शिकायत के अनुसार वर्तमान व्यवस्था में सेवा निवृत कर्मचारियों को सूचीबद्ध अस्पतालों में अपनी पसंद का अस्पताल चुनने की सुविधा है, जबकि सेवा में रहने वाले कर्मचारियों को रेफरल जारी करने वाले चिकित्सा पदाधिकारी द्वारा किसी निश्चित अस्पताल में उपचार करने के लिए गलत ढंग से बाध्य किया जाता है. पत्र में यह भी आरोप लगाया गया है कि यदि कोई अस्पताल कंपनी के पैनल में शामिल हैं और संबंधित बीमारी का उपचार करने में सक्षम है, तो सामान्य परिस्थितियों में सेवारत कर्मचारियों को स्वतंत्र रूप से अस्पताल को चुनने का विकल्प मिलना चाहिए। अभी लागू नियमों के अनुसार सेवा निवृत कर्मचारियों को चुनाव का अधिकार तो उपलब्ध है, परंतु सेवारत कर्मचारी के पास यह अधिकार नहीं है. जिस कारण सेवारत कर्मचारियों को मानसिक उत्पीड़न झेलना पड़ता है. कहा गया है कि रेफरल प्रक्रिया में कुछ निजी अस्पतालों को प्राथमिकता मिलती है.
आखिर रेलवे की तरह कोल इंडिया में नियम का क्यों नहीं होता पालन ?
मरीज का एक स्थान पर अधिक पहुंचने से अस्पतालों में खर्च की असमानता की वजह से कंपनी की चिकित्सा बजट पर अतिरिक्त बोझ भी पड़ता है. इस वजह से बीसीसीएल के शेयर धारकों को नुकसान हो रहा है. शिकायतकर्ता ने रेफरल निर्णय को प्रभावित करने वाले अनुचित एक्शन की भी जांच कराने की मांग की है. भारतीय रेलवे की नीति का उदाहरण भी दिया गया है. रेलवे बोर्ड ने 29 अगस्त 2024 के अपने स्वास्थ्य संबंधी निर्देशों में स्पष्ट किया था कि रेफरल सामान्यत किसी विशेष सूचीबद्ध अस्पताल के नाम पर जारी नहीं किया जाना चाहिए। इस मॉडल के तहत चिकित्सा पदाधिकारी रेफर करते समय किसी विशेष हॉस्पिटल का नाम नहीं लिखते हैं, बल्कि किसी भी सूचीबद्ध अस्पताल के लिए रेफर लिखते हैं । लाभार्थी सूचीबद्ध संस्थानों में से अस्पताल का चयन के लिए स्वतंत्र होता है.
सभी मामलों की जाँच करा दी जाये तो बड़ा घोटाला आ सकता है सामने
शिकायतकर्ता ने इसी सिद्धांत पर कोल् इंडिया लिमिटेड और उसकी सहायक कंपनियों के लिए एक समान पारदर्शी चिकित्सा रेफरल नीति अपनाने की मांग की है. पत्र में कोल इंडिया और बीसीसीएल को पहले भेजे गए पत्रों का उल्लेख भी किया गया है. पूछा गया है कि उनकी शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई? आखिर ऐसी क्या बाध्यता है कि कंपनी के सेवानिवृत कर्मचारी अपने इलाज के लिए अस्पतालों का चयन कर सकते हैं और कार्यरत कर्मचारियों को रेफर होते समय दबाव का सामना करना पड़ता है? दरअसल, रेफरल नीति को लेकर कई बार सवाल किए गए हैं. सूत्र तो यह भी बता रहे हैं कि अगर पूरे मामले की संचिकाओं को इकट्ठा कर इसकी जांच करा दी जाए, तो एक बहुत बड़ा घोटाला सामने आ सकता ही. रेफरल व्यवस्था में शामिल अधिकारियों का चेहरा बेनकाब हो सकता है. कर्मचारियों को राहत मिल सकती है. कंपनी का पैसा भी बच सकता है.