कौन थे निरसा के सुशांतो सेनगुप्ता, जिनकी आज ही के दिन 2002 में कर दी गई थी हत्या? बाद में पत्नी बनी मंत्री
निरसा के कद्दावर नेता रहे सुशांतो सेनगुप्ता की आज ही के दिन 2002 में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. यह हत्या एके-47 से अंधाधुंध गोलियां बरसाकर की गई थी. इस हत्याकांड में सुशांत सेनगुप्ता के छोटे भाई संजय सेन गुप्ता और उनके सहयोगी डीडी पाल की मौके पर ही मौत हो गई थी.
धनबाद (DHANBAD): निरसा के कद्दावर नेता रहे सुशांतो सेनगुप्ता की आज ही के दिन 2002 में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. यह हत्या एके-47 से अंधाधुंध गोलियां बरसाकर की गई थी. इस हत्याकांड में सुशांत सेनगुप्ता के छोटे भाई संजय सेन गुप्ता और उनके सहयोगी डीडी पाल की मौके पर ही मौत हो गई थी. यह घटना जीटी रोड पर गोपालगंज मोड़ (निरसा) पर हुई थी. इस घटना ने कोयलांचल को चौंका दिया था. जिस समय सुशांत सेन गुप्ता की हत्या हुई, उस समय वह ऑल इंडिया फारवर्ड ब्लाक के प्रदेश उपाध्यक्ष थे. इसके पहले निरसा के विधायक गुरदास चटर्जी की हत्या साल 2000 में कर दी गई थी. सुशांत सेनगुप्ता अपने भाई और सहायक के साथ धनबाद कोर्ट से निरसा जा रहे थे कि गोपालगंज मोड़ के पास घात लगाए अपराधियों ने अंधाधुंध फायरिंग झोंक दी. नतीजा हुआ कि तीन लोगों की घटनास्थल पर ही मौत हो गई.
पति सुशांत सेनगुप्ता की हत्या के बाद अपर्णा सेनगुप्ता राजनीति में आई
सुशांत सेनगुप्ता की हत्या के बाद उनके राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेवारी पत्नी अपर्णा सेनगुप्ता के कंधे पर आ गई. घर से निकलकर यह महिला राजनीति में कदम रखा. निरसा विधानसभा की सड़कों को नापने लगी, लोगों का सहारा बनने की कोशिश करने लगी. पार्टी ने भी अपर्णा सेनगुप्ता पर भरोसा दिखाया. 2005 में फारवर्ड ब्लाक के टिकट पर पहली बार वह निरसा से विधायक चुनी गई. वह झारखंड में मंत्री भी रही. 2019 में भाजपा के टिकट पर चुनाव जीता, फिलहाल वह भाजपा में ही हैं. यह अलग बात है कि अपर्णा सेनगुप्ता भी लाल झंडा से ही भाजपा में शामिल हुई थी. 2005 में वह फॉरवर्ड ब्लॉक से चुनाव जीती थी. फिर 2019 के चुनाव में उन्होंने मार्क्सिस्ट कोऑर्डिनेशन कमेटी के अरूप चटर्जी को पछाड़कर विधायक बनी. अपर्णा सेनगुप्ता को 89,082 वोट मिले तो अरूप चटर्जी को 63,624 और झारखंड मुक्ति मोर्चा के अशोक मंडल को 47,168 वोट प्राप्त हुए थे.
निरसा विधानसभा क्षेत्र में बंगाली कल्चर का बोलबाला है
वैसे, बंगाल से सटे होने के कारण निरसा विधानसभा क्षेत्र में बंगाली कल्चर का बोलबाला है. पहले यहां गुरुदास चटर्जी और कृपा शंकर चटर्जी के बीच चुनावी टकराहट होती थी. कृपा शंकर चटर्जी भी पहले लाल झंडा में थे, लेकिन वह कांग्रेस में चले आए थे. गुरुदास चटर्जी तो लाल झंडा में थे ही. गुरुदास चटर्जी की राजनीति थोड़ी अलग थी. लोगों के वह प्रिय थे. पहले वह ईसीएल के कर्मचारी थे लेकिन मारपीट और फायरिंग के मामले में उन्हें जेल जाना पड़ा. जेल से छूटने के बाद उन्होंने नौकरी त्याग दी और पूरी तरह से राजनीति में आ गए. राजनीति में आए तो पूर्व सांसद एके राय का साथ मिला. फिर वह पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा. यह अलग बात है कि उनकी हत्या कर दी गई. वह धनबाद से निरसा लौट रहे थे कि देवली में उन्हें गोली मार दी गई. उनकी हत्या के बाद उनके पुत्र अरूप चटर्जी चुनावी अखाड़े में कूदें.