झारखंड के इस संस्थान के रिसर्च से अब बहुत आसानी से नहीं बहेंगें बाँध, बीस साल के लिए क्यों मिला पेटेंट, पढ़िए
IIT (ISM) धनबाद की रिसर्च टीम को फ्लाई ऐश से बांधों को मजबूत बनाने वाली नई तकनीक के लिए भारतीय पेटेंट मिला है.
IIT (ISM) धनबाद की रिसर्च टीम को फ्लाई ऐश से बांधों को मजबूत बनाने वाली नई तकनीक के लिए भारतीय पेटेंट मिला है.
धनबाद (DHANBAD): IIT (ISM) के एक रिसर्च से अब बांधों को फ्लाई ऐश से मजबूती मिलेगी. झारखण्ड के लिए यह एक बहुत बड़ी कामयाबी है, पेटेंट भी मिल गया है. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स), धनबाद की एक रिसर्च टीम ने “अर्थन डैम स्ट्रक्चर विद कॉम्पैक्टेड क्ले–फ्लाई ऐश-लाइम कोर” के लिए इंडियन पेटेंट हासिल किया है. यह तकनीक अर्थन डैम में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक क्ले कोर के एक टिकाऊ विकल्प के रूप में विकसित की गई है. पेटेंट नंबर 601531 भारत सरकार के पेटेंट ऑफिस की ओर से 4 सितंबर 2026 को प्रदान किया गया. पेटेंट के लिए आवेदन 30 अक्टूबर 2025 को फाइल किया गया था और यह पेटेंट फाइलिंग की तारीख से 20 साल की अवधि के लिए दिया गया है. इस तकनीक के आविष्कारकों में सुबोध श्रीवास्तव, रिसर्च स्कॉलर, सिविल इंजीनियरिंग, आईआईटी (आईएसएम) धनबाद, स्वर्गीय डॉ. श्रीनिवास पसुपुलेटी, पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर, सिविल इंजीनियरिंग, आईआईटी (आईएसएम) धनबाद; डॉ. विश्वनाथ एन. खत्री, एसोसिएट प्रोफेसर, सिविल इंजीनियरिंग, आईआईटी (आईएसएम) धनबाद; और डॉ. आशेष बनर्जी, पूर्व रिसर्च स्कॉलर, सिविल इंजीनियरिंग, आईआईटी (आईएसएम) धनबाद तथा असिस्टेंट प्रोफेसर, बीआईटी मेसरा शामिल हैं.
यह रिसर्च मई 2025 में पीएचडी प्रोग्राम के तहत शुरू की गई थी
यह रिसर्च मई 2025 में पीएचडी प्रोग्राम के तहत शुरू की गई थी. इसका उद्देश्य अर्थन डैम में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक क्ले कोर के लिए एक टिकाऊ विकल्प तैयार करना था. रिसर्च में क्ले के एक हिस्से को फ्लाई ऐश, जो एक औद्योगिक उप-उत्पाद है, से बदलने और इसके बाद मिश्रण को लाइम के जरिए स्थिर करने का अध्ययन किया गया. यह काम करीब छह महीने में पूरा हुआ. रिसर्च के लिए किसी बाहरी फंडिंग का इस्तेमाल नहीं किया गया और संस्थान की रिसर्च सुविधाओं का उपयोग किया गया. डेवलप किया गया क्ले–फ्लाई ऐश–लाइम कंपोजिट अर्थन डैम के इम्परवियस कोर के रूप में इस्तेमाल करने के लिए तैयार किया गया है. इसका उद्देश्य नेचुरल क्ले पर निर्भरता कम करने के साथ डैम स्ट्रक्चर में सीपेज कंट्रोल, स्ट्रेंथ और स्टेबिलिटी को बेहतर करना है. यह तकनीक खास तौर पर उन इलाकों में उपयोगी हो सकती है, जहां क्ले की उपलब्धता सीमित है, लेकिन फ्लाई ऐश आसानी से उपलब्ध है. हालांकि, बड़े स्तर पर इस्तेमाल से पहले साइट के हिसाब से आर्थिक आकलन और फील्ड स्तर पर जांच जरूरी होगी.
4 सितंबर 2026 को पेटेंट, बीस सालो के लोए प्रदान किया गया है
स्वर्गीय डॉ. श्रीनिवास पसुपुलेटी, पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर, सिविल इंजीनियरिंग विभाग, इस पेटेंटेड तकनीक के आविष्कारकों में शामिल थे. उनका 9 जून 2026 को विजयवाड़ा, आंध्र प्रदेश में निधन हो गया था. उन्होंने 29 मई 2013 को इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स, धनबाद ज्वाइन किया था और 1 जुलाई 2024 से सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख के रूप में कार्य किया था. उनके निधन के बाद 4 सितंबर 2026 को यह पेटेंट प्रदान किया गया, जिसमें रिसर्च में उनके योगदान को भी मान्यता मिली है. आगे की रिसर्च में मटेरियल के अलग-अलग अनुपात को और बेहतर करने, इसकी लंबे समय तक टिकाऊ क्षमता की जांच तथा अलग-अलग हाइड्रोलिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों में बड़े स्तर पर मॉडल और फील्ड जांच करने पर फोकस किया जाएगा.