धनबाद (DHANBAD): झारखंड में कांग्रेस के बड़े नेता प्रदीप कुमार बालमुचू की अब कोयला मजदूर संगठन में एंट्री हो गई है. इसके पहले राष्ट्रीय स्तर पर पूर्व सांसद धीरज साहू की एंट्री हुई थी. जानकारी के अनुसार झारखंड प्रदेश इंटक के वह प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए हैं. पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष पूर्व सांसद स्वर्गीय ददई दुबे थे. उनके समय में इंटक दो भागों में बंट गई थी. एक इंटक (ददई ) गुट तो दूसरा इंटक (रेड्डी) कहा जाता था. दोनों यूनियनों को लेकर काफी विवाद रहा, विवाद अभी भी है. जानकार बताते हैं कि दोनों यूनियनों को एक करने के लिए कांग्रेस नेत्री सोनिया गांधी ने भी हस्तक्षेप किया था. उन्होंने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष को विवाद खत्म कराने की जिम्मेदारी दी थी. कई बैठक भी हुई, लेकिन मामला नहीं सालता.
राजेंद्र बाबू और ददई दुबे में चल रहा था विवाद
दरअसल, इस विवाह ने इतना तूल पकड़ लिया था कि कोई पीछे हटने को तैयार नहीं था और दोनों यूनियन चल रही थी. इस बीच ददई दुबे का निधन हो गया. निधन होने के बाद जैसी की सूचना है झारखंड के लोहरदगा में ददई गुट की यूनियन का सम्मेलन हुआ था और उस सम्मेलन में पूर्व सांसद धीरज प्रसाद साहू को यूनियन का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया था. उसके बाद से ही यूनियन की गतिविधियां चल रही थी. धीरज साहू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद यूनियन की गतिविधियां चल रही थी, इसी बीच रांची में झारखंड प्रदेश इंटक की कार्यकारिणी की बैठक हुई और इस बैठक में डॉक्टर प्रदीप कुमार बालमुचू को इंटक का प्रदेश अध्यक्ष निर्वाचित किया गया.
बिहार और झारखंड में भी मंत्री पद पर रहे
ददई दुबे की कोयला मजदूर संगठन में अच्छी पैठ थी. बाबा के नाम से प्रसिद्ध ददई दुबे बिहार में भी राबड़ी देवी के मंत्रिमंडल में मंत्री रहे, तो झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार में भी मंत्री रहे. जानकारी के अनुसार 2000 में बिहार में राबड़ी देवी की सरकार में मंत्री बने, तो 2013 में हेमंत सोरेन की सरकार में मंत्री रहे. वह ट्रेड यूनियन के सहारे पॉलिटिक्स में आये. विश्रामपुर से विधायक रहे, इंटक के कद्दावर नेता रहे. किसी के दबाव में नहीं आना, उनके स्वभाव में था. इस वजह से कई मौको पर उन्हें नुकसान भी हुआ. लेकिन समझौतावादी राजनीति से हमेशा उन्होंने परहेज किया. इंटक की राजनीति में भी वह मजबूत नेता के रूप में जाने जाते थे. बाद में इंटक में राजेंद्र प्रसाद सिंह का कद बढ़ा, तो दोनों के रिश्तों में खटास आ गया. हालांकि राजेंद्र बाबू भी अब इस दुनिया में नहीं है.
ददई दुबे और राजेंद्र सिंह के बीच के विवाद से इंटक को भी बड़ा नुकसान हुआ
ददई दुबे और राजेंद्र सिंह के बीच चल रहे विवाद की वजह से ही इंटक को जेबीसीसीआई से बाहर होना पड़ा था. दोनों अपने-अपने सोच के नेता थे. हालांकि कांग्रेस आलाकमान ने भी दोनों को एक करने की भरसक कोशिश की. लेकिन कामयाबी नहीं मिली. यह अलग बात है कि 2004 में ददई दुबे धनबाद से सांसद चुने गए थे. कोयला मजदूरों में पकड़ की वजह से ही उन्हें धनबाद से कांग्रेस ने टिकट दिया था. 5 साल धनबाद के सांसद रहने के दौरान अपने अलग अंदाज से उन्होंने खुद की पहचान बनाई और कोयलांचल के "बाबा" बन गए. भाजपा का गढ़ माने जाने वाले धनबाद लोकसभा सीट पर उन्होंने कांग्रेस का पताका लहराया.
2004 में कांग्रेस टिकट पर बने थे सांसद
धनबाद में भाजपा के विजय रथ को रोक दिया था. उन्होंने चार बार के सांसद प्रोफेसर रीता वर्मा को पराजित कर दिया था. धनबाद लोकसभा सीट 1991, 1996, 1998 तथा 1999 में भाजपा के पास थी. 2004 में वह धनबाद लोकसभा से सांसद चुने गए. उसके बाद कोयला श्रमिकों की राजनीति में वह तेजी से उभरे. 2009 में ददई दुबे को हराकर पशुपतिनाथ सिंह धनबाद से पहली बार सांसद बने थे. 2009 लोकसभा चुनाव हारने के बाद वह विश्रामपुर से विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की थी. 2014 लोकसभा चुनाव में ददई दुबे एक बार फिर कांग्रेस का धनबाद से टिकट के लिए कोशिश की. कांग्रेस ने उनकी जगह अजय दुबे को धनबाद से प्रत्याशी बना दिया. इससे नाराज होकर ददई दुबे तृणमूल कांग्रेस में चले गए. तृणमूल कांग्रेस ने धनबाद से उन्हें अपना लोकसभा का प्रत्याशी बनाया. लेकिन वह चुनाव हार गए.

