जयराम महतो, बाबूलाल मरांडी के बाद राधा कृष्ण किशोर! क्यों झारखंड में छिड़ गई नई बहस, विशेषाधिकार का दायरा बढ़ाने की क्यों हुई मांग ?
जयराम महतो और पुलिस विवाद के बीच वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर की विधायकों के विशेषाधिकार बढ़ाने की मांग से झारखंड की सियासत में नई चर्चा छिड़ गई है.
धनबाद (DHANBAD): क्या विधायक जयराम महतो, नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी और वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर के सुर मिल रहे है. मांग के अलग-अलग तरीके ने झारखंड में एक नया बहस छेड़ दिया है. हालांकि वित्त मंत्री ने मांग की है कि कार्रवाई एकतरफ़ा नहीं होनी चाहिए. अगर विधायक किसी के साथ दुर्व्यवहार करते है, तो उन पर भी कार्रवाई होनी चाहिए. लेकिन उनके डिमांड को झारखंड की राजनीति में एक अलग तरह के चश्मे से देखा जा रहा है. झारखंड के चर्चित विधायक जयराम महतो को कोर्ट से अग्रिम जमानत मिल गई है. आंदोलन की राह पकड़े झारखंड पुलिस एसोसिएशन भी बैकफुट पर दिख रहा है. नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी का जयराम महतो को पूरा समर्थन मिल रहा है. जयराम महतो भी साहिबगंज के मामले को लेकर बाबूलाल मरांडी का पुरजोर समर्थन कर रहे हैं. कह रहे हैं कि मेरी उम्र अभी कम है, मैं लड़ सकता हूं, भिड़ सकता हूँ, लेकिन बाबूलाल जी की उम्र अब यह सब करने को स्वीकार नहीं करेगी.
झारखंड के वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर के पत्र के बाद चर्चा तेज
इस बीच झारखंड के वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर का एक पत्र सामने आया है. इस पत्र को भी लोग इसी विवाद के चश्मे से देख रहे है. उल्लेखनीय है कि वित्त मंत्री ने विधायकों के विशेषाधिकार का दायरा बढ़ाने की मांग की है. विधानसभा अध्यक्ष को पत्र पत्र लिखा है. उन्होंने विधानसभा की कार्य संचालन नियमावली में संशोधन करने का अनुरोध किया है. उनकी मांग है कि अधिकारियों द्वारा विधायकों से अशिष्ट व्यवहार, पत्रों की अनदेखी, जानबूझकर जनहित के मामले को टालना भी विशेष अधिकार हनन के दायरे में लाया जाए. विधायकों के विशेष अधिकार को केवल सदन की कार्यवाही तक सीमित नहीं रखना चाहिए. यह अलग बात है कि इसके पहले वित्त मंत्री ने डीजीपी पर अनदेखी का आरोप लगाया था. जनप्रतिनिधियों की अवहेलना किए जाने का मामला भी वह लगातार उठाते रहे है. उनका आरोप है कि विधायकों के पत्रों का समय पर जवाब नहीं मिलना, फोन नहीं उठाना और जनहित से जुड़े सुझावों की अनदेखी करना आम शिकायत बन गई है.
उन्होंने यह भी कहा है कि प्रस्तावित व्यवस्था एकतरफ़ा नहीं होनी चाहिए. यदि कोई जन प्रतिनिधि किसी अधिकारी के साथ अभद्रता या दुर्व्यवहार करते हैं, तो उस पर भी नियम के अनुसार कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए. वित्त मंत्री ने संविधान के अनुच्छेद 194 का उल्लेख करते हुए कहा कि सदन के भीतर बिना भय और दबाव के जनहित के मुद्दे उठाने के लिए विधायकों को विशेषाधिकार प्राप्त है. उन्होंने स्पष्ट किया कि शिष्टाचार और विशेषाधिकार अलग-अलग विषय हैं. उन्होंने सुझाव दिया कि जानबूझकर विधायक के प्रति अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल, सरकारी कार्यालय में असम्मानजनक व्यवहार, सदन अथवा सदन के बाहर उठाए गए जनहित के मुद्दों को जानबूझकर टालना तथा प्रोटोकॉल संबंधी सरकारी निर्देशों का पालन नहीं करना विशेषाधिकार हनन की श्रेणी में शामिल किया जाए. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि यह व्यवस्था जनप्रतिनिधियों पर भी समान रूप से लागू होनी चाहिए. यदि कोई विधायक किसी अधिकारी के साथ जानबूझकर गाली-गलौज या दुर्व्यवहार करता है, तो उसके खिलाफ भी विधिसम्मत कार्रवाई होनी चाहिए. उल्लेखनीय है कि अभी विधायक जयराम महतो और धनबाद के बरवाअड्डा थानेदार के बीच के विवाद को लेकर पूरे झारखंड में नई बहस छिड़ी हुई है. विधायक पर आरोप है कि उन्होंने थानेदार के खिलाफ अप-शब्दों का प्रयोग किया, जबकि विधायक का कहना है कि थानेदार की भाषा भी गलत थी. इस मामले को लेकर विधायक पर मुकदमा भी दर्ज किया गया है, जिस मामले में उन्हें अग्रिम जमानत मिल गई है.