सोरेन परिवार के हर अच्छे -बुरे दौर में पढ़िए कैसे ठिकाना -आश्रय देता रहा है धनबाद 

धनबाद के बरवाअड्डा क्षेत्र में रूपी सोरेन और उनके परिवार से जुड़ी पुरानी स्मृतियां फिर ताजा हो गई हैं. झारखंड आंदोलन के दौर में शिबू सोरेन की सक्रियता और परिवार के संघर्ष की कई यादें आज भी स्थानीय लोगों के बीच जीवंत हैं.

सोरेन परिवार के हर अच्छे -बुरे दौर में पढ़िए कैसे ठिकाना -आश्रय देता रहा है धनबाद

धनबाद (DHANBAD): झारखंड की राजनीतिक और अलग राज्य आंदोलन  के इतिहास में धनबाद की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है. देश के स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर अलग झारखंड राज्य के आंदोलन तक, इस धरती ने संघर्ष की अनेक कहानियां देखी हैं. इसी इतिहास के पन्नों में झारखंड आंदोलन के अगुआ रहे शिबू सोरेन और उनके परिवार की कई यादें भी दर्ज हैं. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां और शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन के निधन की खबर के बाद धनबाद के बरवाअड्डा क्षेत्र में भी शोक है.  उनके निधन के साथ ही उनसे जुड़ी पुरानी स्मृतियां एक बार फिर लोगों की बातचीत का हिस्सा बन गई हैं. बाजार समिति, बरवाअड्डा  के पास  पांडेय बरवा टोला में रूपी सोरेन और उनके परिवार का वर्षों तक आना-जाना रहा.यह वह दौर था, जब अलग झारखंड राज्य और महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन तेज हो रहा था. . करीब 1970 के दशक में शिबू सोरेन आंदोलन के सिलसिले में लगातार घर से दूर रहते थे. धनबाद से सटे टुंडी के जंगल और पहाड़ उनकी गतिविधियों के प्रमुख केंद्रों में शामिल थे. कई बार वे लंबे समय तक घर नहीं लौट पाते थे. 

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एक समय ऐसा भी आया जब जब पति को खोजने जंगल-पहाड़ों तक पहुंचीं रूपी सोरेन

परिवार से जुड़ी पुरानी स्मृतियों के अनुसार, एक समय ऐसा भी आया जब शिबू सोरेन लंबे समय तक घर नहीं लौटे. परिवार को उनकी चिंता सताने लगी. तब रूपी सोरेन ने अपने पति की तलाश में जंगल और पहाड़ों की ओर जाने का निर्णय लिया. वह अकेली नहीं थीं. उनकी सास और ननद भी उनके साथ रहती थीं. उस समय उनकी गोद में बड़े बेटे दुर्गा सोरेन भी थे, एक ओर रूपी सोरेन पति के संघर्ष को बेहद करीब से देख रही थीं, तो दूसरी ओर बच्चों और पूरे परिवार की जिम्मेदारी भी संभाल रही थीं. यह उनके जीवन का ऐसा दौर था, जिसमें व्यक्तिगत कठिनाइयों के साथ सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष भी जुड़ा हुआ था. आंदोलन के उस दौर में पुलिस की गतिविधियां भी तेज थीं. शिबू सोरेन के घर पहुंचकर पुलिस उनके बारे में पूछताछ करती थी. ऐसे कठिन समय में परिवार को संभालना और आंदोलन से जुड़े लोगों के साथ रिश्ते बनाए रखना आसान नहीं था.

 

Imageआंदोलनकारियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बना था ठाकुरदास सोरेन का घर

बरवाअड्डा के पांडेय बरवा में झारखंड आंदोलनकारी स्वर्गीय ठाकुरदास सोरेन के घर का भी उस दौर से गहरा संबंध रहा है. ठाकुरदास सोरेन के पुत्र गोपीकांत सोरेन ने अपने माता-पिता से सुनी पुरानी यादें साझा करते हुए बताया कि 1970 के दशक में शिबू सोरेन और रूपी सोरेन विभिन्न गांवों में होने वाले आंदोलनों में शामिल होते थे. आंदोलन के बाद उनका ठाकुरदास सोरेन के घर आना-जाना होता था. उस समय उनका घर आंदोलनकारियों के लिए एक भरोसेमंद और सुरक्षित ठिकाने की तरह था. इसी नियमित संपर्क के दौरान शिबू सोरेन, रूपी सोरेन और ठाकुरदास सोरेन के परिवार के बीच आत्मीय संबंध गहरे होते चले गए. समय के साथ आंदोलन आगे बढ़ा, राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और शिबू सोरेन झारखंड की राजनीति के बड़े चेहरे बने, लेकिन पुराने रिश्तों की गर्माहट बनी रही.

मुख्यमंत्री बनने के बाद भी धनबाद  से बना रहा सोरेन परिवार का रिश्ता 

शिबू सोरेन के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी बरवाअड्डा के पांडेय बरवा से परिवार का संपर्क बना रहा. रूपी सोरेन भी समय-समय पर यहां आती रहीं स्थानीय परिवार के लोगों के अनुसार, आदिवासी पर्व और त्योहारों के प्रति उनका विशेष लगाव था. इन अवसरों पर उनका यहां आना-जाना केवल औपचारिक नहीं, बल्कि पारिवारिक आत्मीयता से जुड़ा हुआ था. स्थानीय लोगों के लिए रूपी सोरेन की पहचान केवल एक बड़े राजनीतिक परिवार की सदस्य के रूप में नहीं थी. आंदोलन के कठिन दौर में बने रिश्तों के कारण उनके साथ एक आत्मीय जुड़ाव रहा. यही वजह है कि उनके निधन की खबर ने बरवाअड्डा के उन परिवारों को भी भावुक कर दिया, जिनकी स्मृतियों में वह वर्षों से जुड़ी हुई थीं.आज जब रूपी सोरेन की पुरानी यादें सामने आ रही हैं, तो उनके जीवन का वह पक्ष भी सामने आता है, जो राजनीति की सुर्खियों से कहीं दूर था—एक पत्नी का संघर्ष, एक मां की जिम्मेदारी और आंदोलन के कठिन दौर में परिवार को संभालती एक महिला की दृढ़ता. धनबाद और टुंडी की जंगल-पहाड़ियों से जुड़ी ये स्मृतियां उनके जीवन और झारखंड आंदोलन के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर रह गई हैं.

रिपोर्ट -प्रकश महतो