9 साल 9 महीने, 337 तारीखें और फिर फैसला टला, जानिए रंजय सिंह हत्याकांड की पूरी कहानी
कोयलांचल के बहुचर्चित रंजय सिंह हत्याकांड में शनिवार, 5 सितंबर 2026 को आने वाला फैसला तकनीकी कारणों से टल गया. अब अदालत अगली तारीख तय करेगी.
कोयलांचल के बहुचर्चित रंजय सिंह हत्याकांड में शनिवार, 5 सितंबर 2026 को आने वाला फैसला तकनीकी कारणों से टल गया. अब अदालत अगली तारीख तय करेगी.
टीएनपी डेस्क : कोयलांचल के बहुचर्चित रंजय सिंह हत्याकांड में शनिवार, 5 सितंबर 2026 को आने वाला फैसला तकनीकी कारणों से टल गया. एमपी-एमएलए विशेष न्यायालय में आज इस मामले में निर्णय सुनाया जाना था, लेकिन तकनीकी वजह से ऐसा नहीं हो सका. अब अदालत अगली तारीख तय करेगी. करीब नौ साल नौ महीने से लंबित इस मामले में 337 तारीखों पर सुनवाई हो चुकी है और अभियोजन पक्ष की ओर से 23 गवाह पेश किए गए हैं.
रंजय सिंह हत्याकांड सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या का मामला नहीं है. इसके पीछे धनबाद के उस चर्चित राजनीतिक और सामाजिक इतिहास की परछाई भी दिखाई देती है, जिसकी एक बड़ी पहचान सिंह मेंशन और रघुकुल के रूप में रही है. कभी एक ही छत के नीचे रहने वाला एक बड़ा परिवार समय के साथ अलग-अलग धड़ों में बंटा और फिर यही पारिवारिक दूरी धनबाद की राजनीति में भी दिखाई देने लगी.
कौन थे रंजय सिंह
रंजय सिंह उर्फ रवि रंजन सिंह को झरिया के तत्कालीन भाजपा विधायक संजीव सिंह का बेहद करीबी माना जाता था. कई रिपोर्टों में उन्हें संजीव सिंह का दाहिना हाथ तक बताया गया है. रंजय का सिंह परिवार से पुराना संपर्क था. रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने सूर्यदेव सिंह के बड़े पुत्र राजीव रंजन सिंह के साथ कोयला कारोबार में भी काम किया था. बाद के दौर में वह संजीव सिंह के बेहद करीबी सहयोगी के रूप में पहचाने जाने लगे.
29 जनवरी 2017 की शाम करीब 5.30 बजे सरायढेला थाना क्षेत्र के चाणक्य नगर मोड़ पर बिग बाजार के सामने रंजय सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई. वह अपने सहयोगी राजा यादव के साथ जा रहे थे. इसी दौरान हमलावरों ने उन्हें निशाना बनाया. गोली लगने से रंजय की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि राजा यादव बच गए. बाद में राजा यादव इस मामले के प्रमुख चश्मदीद गवाह बने.
पुलिस जांच में नंद कुमार सिंह उर्फ मामा को मुख्य शूटर बताया गया. हर्ष सिंह पर हत्या की साजिश और कथित तौर पर शूटरों को मदद पहुंचाने का आरोप लगाया गया. हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी आना बाकी है.
एक जमाना था जब पूरा परिवार एक साथ रहता था
रंजय सिंह की कहानी को समझने के लिए सिंह मेंशन और रघुकुल की कहानी को समझना जरूरी है.
धनबाद में एक दौर ऐसा था जब सूर्यदेव सिंह का परिवार एकजुट शक्ति के रूप में जाना जाता था. सूर्यदेव सिंह को परिवार का मुखिया माना जाता था. उनके साथ उनके भाई राजन सिंह, रामधीर सिंह और बच्चा सिंह का परिवार भी जुड़ा हुआ था. सूर्यदेव सिंह के पुत्र राजीव रंजन, संजीव, मनीष और परिवार के दूसरे सदस्य भी इसी बड़े पारिवारिक दायरे का हिस्सा थे.
रिपोर्टों के मुताबिक सूर्यदेव सिंह के जीवनकाल में परिवार के कई सदस्य सिंह मेंशन में साथ रहते थे. धनबाद से लेकर पैतृक गांव तक परिवार की संपत्ति और पारिवारिक जीवन में साझा व्यवस्था की तस्वीर दिखाई देती थी. उस दौर में सिंह मेंशन सिर्फ एक मकान का नाम नहीं था. यह धनबाद की राजनीति, कोयला कारोबार और सामाजिक प्रभाव में एक बड़े शक्ति केंद्र के तौर पर देखा जाता था.
सूर्यदेव सिंह लगातार चार बार झरिया से विधायक रहे. उनके राजनीतिक प्रभाव ने सिंह मेंशन को धनबाद की राजनीति में एक अलग पहचान दी. उनके निधन के बाद परिवार के भीतर परिस्थितियां बदलने लगीं और धीरे-धीरे एकजुट परिवार अलग-अलग धड़ों में दिखाई देने लगा.
सिंह मेंशन से अलग हुआ रघुकुल
सूर्यदेव सिंह के निधन के बाद परिवार में मनमुटाव और संपत्ति तथा राजनीतिक वर्चस्व से जुड़े विवाद बढ़ते गए. राजन सिंह और बच्चा सिंह के परिवार के अलग होने के बाद रघुकुल एक अलग पहचान के साथ सामने आया. राजन सिंह के पुत्र नीरज सिंह ने आगे चलकर रघुकुल को धनबाद की राजनीति में मजबूत राजनीतिक पहचान दिलाई.
नीरज सिंह का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा. वर्ष 2010 में उन्होंने धनबाद नगर निगम के डिप्टी मेयर का चुनाव जीता था. बाद में उन्होंने झरिया की राजनीति में भी अपनी मजबूत पहचान बनाई. वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में नीरज सिंह कांग्रेस के उम्मीदवार थे, जबकि उनके चचेरे भाई संजीव सिंह भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में थे. यह चुनाव परिवार के दो अलग राजनीतिक धड़ों के आमने-सामने आने का बड़ा उदाहरण बना.
यानी जिस परिवार की राजनीतिक ताकत कभी एकजुटता में थी, उसी परिवार के सदस्य आगे चलकर अलग-अलग राजनीतिक खेमों में खड़े दिखाई देने लगे.
रंजय की हत्या के बाद बदल गया घटनाक्रम
29 जनवरी 2017 को रंजय सिंह की हत्या हुई. रंजय संजीव सिंह के बेहद करीबी माने जाते थे. इस हत्या ने धनबाद के राजनीतिक और कारोबारी हलकों में हलचल पैदा कर दी.
इसके करीब डेढ़ महीने बाद 21 मार्च 2017 को पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह समेत चार लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई. इस हत्याकांड में नीरज सिंह के साथ उनके सहयोगी मुन्ना तिवारी, अशोक यादव और घल्टू महतो की भी मौत हुई.
रंजय सिंह की हत्या और उसके बाद नीरज सिंह की हत्या के बीच सिर्फ करीब 50 दिनों का अंतर था. यही वजह रही कि दोनों घटनाओं को एक-दूसरे से जोड़कर देखा गया. पुलिस की चार्जशीट में नीरज सिंह की हत्या के पीछे कथित प्रतिशोध, पारिवारिक और संपत्ति विवाद तथा राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को प्रमुख कारणों में शामिल किया गया था. चार्जशीट में यह भी आरोप लगाया गया था कि नीरज की हत्या रंजय सिंह की हत्या के बदले में की गई.
हालांकि, यह पुलिस जांच और अभियोजन की थ्योरी थी. इसे अदालत का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता.
नीरज हत्याकांड में संजीव सिंह पर गया शक
नीरज सिंह की हत्या के बाद जांच की दिशा सिंह मेंशन और रघुकुल के बीच पुराने विवादों की तरफ भी गई. पुलिस ने संजीव सिंह सहित कई लोगों को आरोपी बनाया. संजीव सिंह गिरफ्तार हुए और लंबे समय तक जेल में रहे.
इस मामले में पुलिस की चार्जशीट में आरोप लगाया गया था कि रंजय सिंह की हत्या के बाद नीरज सिंह की हत्या को कथित प्रतिशोध के तौर पर अंजाम दिया गया. साथ ही संपत्ति विवाद और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को भी पृष्ठभूमि का हिस्सा बताया गया था.
लेकिन वर्षों तक चले मुकदमे के बाद अगस्त 2025 में एमपी-एमएलए विशेष अदालत ने संजीव सिंह सहित सभी 10 आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया. इसके बाद संजीव सिंह जेल से बाहर आए.
इस फैसले के बाद नीरज हत्याकांड में आरोपियों के खिलाफ अभियोजन की कहानी न्यायिक कसौटी पर साबित नहीं हो सकी.
रूमी सिंह ने पति के लिए मांगा न्याय
रंजय सिंह की हत्या के बाद उनकी पत्नी रूमी सिंह ने न्याय की मांग को लेकर आवाज उठाई. उन्होंने पुलिस और सरकार से हत्यारों तथा कथित साजिशकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी. रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने तत्कालीन पुलिस अधिकारियों को पत्र लिखकर मामले में कार्रवाई की मांग भी की थी.
रूमी सिंह ने अपने पति को धमकी मिलने और उनकी हत्या की आशंका से जुड़े आरोप भी लगाए थे. हालांकि, ऐसे आरोपों को भी अदालत के अंतिम निर्णय के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए.
नौ साल नौ महीने बाद भी इंतजार
रंजय सिंह हत्याकांड में पुलिस ने नंद कुमार सिंह उर्फ मामा को मुख्य शूटर बताया. हर्ष सिंह पर साजिश में शामिल होने और कथित तौर पर मदद करने का आरोप लगाया गया. मामले में 23 गवाहों की गवाही हुई. चश्मदीद राजा यादव की गवाही को भी महत्वपूर्ण माना गया. घटनास्थल से मिले 9 एमएम गोली के खोखे, एफएसएल रिपोर्ट और दूसरे साक्ष्यों को भी अदालत के सामने रखा गया.
करीब 337 तारीखों और लगभग नौ साल नौ महीने की न्यायिक प्रक्रिया के बाद 5 सितंबर 2026 को फैसला आने की उम्मीद थी. लेकिन तकनीकी कारणों से निर्णय टल गया. अब अदालत की अगली तारीख का इंतजार है.
एक परिवार की एकता से लेकर दो राजनीतिक धड़ों तक की कहानी
सिंह मेंशन और रघुकुल की कहानी सिर्फ दो घरों की कहानी नहीं है. यह धनबाद के उस दौर की कहानी भी है, जब एक ही परिवार की राजनीतिक और सामाजिक ताकत पूरे कोयलांचल में प्रभाव रखती थी.
सूर्यदेव सिंह के दौर में परिवार की एकजुटता उसकी सबसे बड़ी ताकत थी. समय के साथ परिवार में दूरियां बढ़ीं. सिंह मेंशन और रघुकुल अलग-अलग पहचान के साथ सामने आए. राजनीतिक रास्ते अलग हुए. संपत्ति और वर्चस्व को लेकर विवाद सामने आए. यहां तक कि एक ही परिवार के सदस्य चुनाव में एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हुए.
इसके बाद रंजय सिंह की हत्या और फिर नीरज सिंह हत्याकांड ने इस पारिवारिक और राजनीतिक कहानी को और रक्तरंजित बना दिया. एक हत्या के बाद दूसरी हत्या को बदले की कड़ी के तौर पर देखा गया और दोनों घटनाओं ने धनबाद की राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित किया.
आज भी सिंह परिवार के अलग-अलग धड़ों का धनबाद और कोयलांचल की राजनीति में प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. हालांकि परिवार के भीतर पहले जैसी एकजुटता नहीं रही, लेकिन राजनीतिक विरासत अब भी अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है.
रंजय सिंह हत्याकांड का फैसला अब अगली तारीख पर होगा. अदालत का निर्णय ही यह तय करेगा कि अभियोजन की ओर से लगाए गए हत्या और साजिश के आरोप न्यायिक कसौटी पर कितने साबित होते हैं. फिलहाल, करीब एक दशक से चल रहे इस मामले में धनबाद की निगाहें अदालत की अगली तारीख पर टिकी हैं.