चतरा के चटनियां बाबा को क्यों माना जाता है चमत्कारी? मन्नत पूरी होने पर क्यों चढ़ाये जाते हैं मिट्टी के हाथी-घोड़े?

झारखंड के चटनियां बाबा पर लोगों की अटूट आस्था है. चटनियां बाबा का प्राचीन स्थल चतरा और लातेहार जिले के सीमावर्ती इलाके में अवस्थित है.

चतरा के चटनियां बाबा को क्यों माना जाता है चमत्कारी? मन्नत पूरी होने पर क्यों चढ़ाये जाते हैं मिट्टी के हाथी-घोड़े?

TNP DESK- झारखंड के चटनियां  बाबा पर लोगों की अटूट आस्था है.  चटनियां  बाबा का प्राचीन स्थल चतरा  और लातेहार जिले के सीमावर्ती इलाके में अवस्थित है.  गांव का नाम सोलगी बताया गया है.  मनोरम प्राकृतिक वादियों के बीच स्थित चटनियां  बाबा का प्राचीन स्थल अनूठी परंपराओं और लोक आस्था के लिए विशेष पहचान संजोये हुए है.   घने जंगलों, चारों ओर से फैली हरियाली और बिल्कुल शांत वातावरण के बीच स्थिति यह  धार्मिक स्थल वर्षों वर्ष से श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र बना हुआ है.  यहां हर दिन दूर- दराज से लोग अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं. 

रविवार को यहां पूजा -अर्चना पूरी तरह से बंद रहती हैं
 
खास बात यह है कि रविवार को यहां पूजा -अर्चना पूरी तरह से बंद रहती हैं.  प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा  यह स्थान धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्रकृति प्रेमियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है. स्थानीय लोगों के अनुसार चटनियां  गोसाई सदियों से क्षेत्र के गांव, पशुओं ,घर- परिवार और समाज को आपदा से बचाते  आ रहे हैं.  इसी लोक विश्वास के कारण चतरा  के अलावे हजारीबाग, लातेहार, गुमला ,कोडरमा, गया, पलामू और आसपास के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु यहां माथा टेकने पहुंचते हैं.  मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मन्नत चटनियां  बाबा के दरबार में पूरी होती है.  मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु अपनी परंपरा और आस्था के अनुसार बकरा और मुर्गे की बलि भी चढ़ाते हैं.  वहीं वैष्णो परंपरा का पालन करने वाले श्रद्धालु जनेऊ  और चावल अर्पित करते हैं.  चटनियां  बाबा के दरबार में मन्नत पूरी होने पर मिट्टी से बने हाथी और घोड़े चढ़ाने  की परंपरा बरसों पुरानी है. 

सैकड़ो मिट्टी के घोड़े और हाथी आस्था तथा विश्वास के प्रतीक हैं
 
मंदिर परिसर में रखे सैकड़ो मिट्टी के घोड़े और हाथी श्रद्धालुओं की आस्था तथा विश्वास के प्रतीक हैं.  यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है.  इस धार्मिक स्थल की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यहां आज भी जनजातीय परंपराओं के अनुसार पूजा -अर्चना कराई जाती है.  गांव के पाहन  यानी पुजारी ही पूजा विधि संपन्न कराते  हैं.  स्थानीय मान्यता के अनुसार रविवार का दिन चटनियाँ  बाबा के पूजा के लिए वर्जित  है.  इस दिन यहां पूजा -अर्चना नहीं होती।  आधुनिक दौर  में चटनियां  बाबा का यह प्राचीन स्थल अपनी पारंपरिक पूजा पद्धति और लोक मान्यताओं को संजोये  हुए है.  यहां का शांत वातावरण, श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक सुकून प्रदान करता है.  चैतन्य बाबा का दरबार न केवल लोक आस्था का केंद्र है, बल्कि जनजातीय संस्कृति और झारखंड के समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण प्रतीक है.