जहां था नक्सलियों का खौफ, अब वहीं रोजगार की बहार, सारंडा में लगेंगे 100 से अधिक साल यूनिट
सारंडा के घने जंगलों से अब नक्सलियों का सफाया हो गया है. सारंडा के नक्सल मुक्त होने के बाद अब स्थानीय लोगों में रोजगार की संभावनाएं भी बढ़ गई है. सारंडा साल जंगल से घिरा है.
चाईबासा (CHAIBASA): सारंडा के घने जंगलों से अब नक्सलियों का सफाया हो गया है. सारंडा के नक्सल मुक्त होने के बाद अब स्थानीय लोगों में रोजगार की संभावनाएं भी बढ़ गई है. सारंडा साल जंगल से घिरा है. साल के पत्ते बेच स्थानीय लोग रोजगार पाते हैं, लेकिन सारंडा के जंगल में नक्सलियों की गतिविधियों के कारण लंबे समय तक ग्रामीणों का जंगल जाना और साल के पत्तों का संग्रह करना प्रभावित रहा. लेकिन अब सारंडा के नक्सल मुक्त होने के बाद ग्रामीण बेखौफ जंगल जा रहे हैं और साल के पत्ते संग्रह कर पत्तों को स्थानीय बाजार में बेच रहे हैं. ऐसे में ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है. अब सारंडा में साल यूनिट लगाकर लोगों की आर्थिक स्थिति और मजबूत करने की तैयारी की जा रही है. वन विभाग सारंडा में 100 से अधिक साल के यूनिट लगाएगा.
70 साल यूनिट लगाए गए
स्थानीय ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए वन विभाग ने साल के यूनिट लगाने शुरु कर दिया है. 100 से अधिक साल के यूनिट लगाए जाएंगे. 70 साल के यूनिट लगाए जा चुके है. जबकि वन विभाग 40 और साल के यूनिट लगाएगा. सारंडा के डीएफओ अभिरुप सिन्हा ने बताया कि 70 साल के यूनिट लगाए जा चुके है. यूनिट में साल के पत्तों का प्रसंस्करण और उत्पाद निर्माण होगा. इससे ग्रामीणों को गांव के आसपास ही रोजगार मिलेगा और उनकी आय बढ़ाने का रास्ता खुलेगा. यूनिट में साल के पत्तों से प्लेट, दोना समेत अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार किए जाएंगे. इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और वन उपज का बेहतर मूल्य मिलेगा. रोजगार के साथ सारंडा में स्थानीय संसाधनों पर आधारित स्वरोजगार को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है. डीएफओ ने कहा कि अब तक ग्रामीण साल के पत्ते बेचते थे. लेकिन अब साल के यूनिट लगने से ग्रामीण पत्तों से बना उत्पाद बाजार में बेच उचित आय प्राप्त कर सकेंगे. ग्रामीणों को साल के पत्तों से उत्पाद बनाने का प्रक्षिक्षण भी दिया जाएगा.
एशिया का सबसे बड़ा साल जंगल है सारंडा
झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले में स्थित सारंडा जंगल को एशिया का सबसे बड़ा और घना साल जंगल माना जाता है. यह जंगल कुल 820 से 900 वर्ग किमी में फैला हुआ है. लेकिन यहां नक्सलियों की गतिविधियों के कारण ग्रामीण साल के पत्तों का संग्रहण नहीं कर पाते थे. अब नक्सलियों के सफाया होने के बाद ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति मजबूत होने की संभावनाएं जागी है. साल के पत्तों से कई उत्पाद तैयार होते है. इसके अलावा बरसात के मौसम में साल के जंगल से ग्रामीण मशरूम और रुगड़ा भी प्राप्त कर अच्छी आमदनी करते है. नक्सलियों के भय से ग्रामीण जंगल में मशरूम चुनने भी नहीं जाते थे.