Explainer : रांची में राज्यसभा चुनाव की दूसरी सीट को लेकर राजनीतिक तापमान चरम पर पहुंच गया है. मतदान से ठीक पहले एनडीए और इंडिया गठबंधन के विधायक अलग-अलग होटलों में शिफ्ट हो चुके हैं. एक तरफ एनडीए के विधायक होटल रेडिसन में ठहरे हैं तो दूसरी ओर इंडिया गठबंधन ने अपने विधायकों को एकजुट रखने की कवायद तेज कर दी है. हॉर्स ट्रेडिंग और क्रॉस वोटिंग की आशंकाओं के बीच अब सबकी निगाहें गुरुवार को होने वाले मतदान पर टिकी हैं.

दो रिक्त सीटों में से एक सीट पर झामुमो उम्मीदवार बैद्यनाथ राम की जीत लगभग तय मानी जा रही है. असली मुकाबला दूसरी सीट पर है, जहां भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार और देश के बड़े उद्योगपति परिमल नाथवानी का सामना इंडिया गठबंधन समर्थित कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा से है.
आंकड़े क्या कहते हैं?
विधानसभा की मौजूदा स्थिति पर नजर डालें तो इंडिया गठबंधन के पास कुल 56 विधायक हैं.
- झामुमो – 34
- कांग्रेस – 16
- राजद – 4
- सीपीआई (माले) – 2
राज्यसभा चुनाव के गणित के अनुसार एक उम्मीदवार को जीत के लिए 28 मतों की जरूरत है.

यदि बैद्यनाथ राम को झामुमो के 28 वोट मिल जाते हैं तो झामुमो के पास 6 विधायक बचेंगे. ऐसे में कांग्रेस के 16, झामुमो के शेष 6, राजद के 4 और माले के 2 विधायक मिलकर कुल 28 वोट प्रणव झा को दिला सकते हैं. इस गणित के हिसाब से दूसरी सीट कांग्रेस के खाते में जाती दिखाई देती है.
फिर नाथवानी को भरोसा किस बात का?
यही वह सवाल है जो राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है.
भाजपा समर्थित परिमल नाथवानी के पास एनडीए के लगभग 24 वोट माने जा रहे हैं. जीत के लिए उन्हें कम से कम 4 अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी. ऐसे में उनका पूरा दांव इंडिया गठबंधन के भीतर संभावित असंतोष, व्यक्तिगत संबंधों और क्रॉस वोटिंग की संभावना पर टिका है.
नाथवानी वर्षों से झारखंड की राजनीति और उद्योग जगत में सक्रिय रहे हैं. कई दलों के नेताओं से उनके व्यक्तिगत संबंध किसी से छिपे नहीं हैं. उनके समर्थकों का दावा है कि विकास कार्यों, व्यक्तिगत संपर्कों और पुराने राजनीतिक रिश्तों के कारण उन्हें गठबंधन के कुछ विधायकों का समर्थन मिल सकता है.

यही कारण है कि जब गणित उनके खिलाफ दिखाई देता है तब भी उन्होंने चुनाव मैदान छोड़ने के बजाय मुकाबला स्वीकार किया है.
हेमंत सोरेन बनाम नाथवानी: असली लड़ाई यहीं है
इस चुनाव को केवल नाथवानी बनाम प्रणव झा की लड़ाई मानना शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी.
असल में यह मुकाबला मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की राजनीतिक पकड़ और भाजपा की रणनीतिक क्षमता के बीच है.
इंडिया गठबंधन का दावा है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में गठबंधन पूरी तरह एकजुट है. गठबंधन के नेताओं का मानना है कि हेमंत सोरेन के निर्देश के खिलाफ जाने की राजनीतिक कीमत कोई विधायक नहीं चुकाना चाहेगा. ऐसे में क्रॉस वोटिंग या मतदान के दिन अनुपस्थित रहने जैसी स्थिति की संभावना बेहद कम है.
यदि गठबंधन के सभी विधायक एकजुट रहते हैं तो प्रणव झा की जीत लगभग तय मानी जाएगी.
फिर एनडीए विधायक होटल में क्यों?
राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यही सबसे दिलचस्प चर्चा है.
यदि टूट-फूट या क्रॉस वोटिंग का खतरा मुख्य रूप से इंडिया गठबंधन में माना जा रहा है, तो फिर एनडीए को अपने विधायकों को होटल में रखने की जरूरत क्यों पड़ी?
कई जानकार इसे भाजपा की रणनीतिक चाल बताते हैं.
उनके अनुसार भाजपा एक साथ दो लक्ष्य साधने की कोशिश कर रही है. पहला, अपने विधायकों को पूरी तरह एकजुट रखना. दूसरा, यह संदेश देना कि उनके विधायकों पर भी दबाव बनाया जा सकता है. इससे राजनीतिक विमर्श का फोकस केवल इंडिया गठबंधन पर नहीं रहता और भाजपा खुद को संभावित "विक्टिम" के रूप में भी पेश कर पाती है.
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह एक प्रकार का "माइंड गेम" है, जिससे चुनाव पूर्व माहौल को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है.
जीत की संभावनाएं किसकी ज्यादा?
प्रणव झा की राह
- यदि इंडिया गठबंधन के सभी 56 विधायक एकजुट रहते हैं.
- कोई क्रॉस वोटिंग नहीं होती.
- कोई विधायक अनुपस्थित नहीं रहता.
ऐसी स्थिति में प्रणव झा की जीत लगभग सुनिश्चित मानी जाएगी.
परिमल नाथवानी की राह
- उन्हें कम से कम 4 अतिरिक्त वोट चाहिए.
- इंडिया गठबंधन के कुछ विधायक क्रॉस वोटिंग करें.
- कुछ विधायक अनुपस्थित रहें या मतदान में तकनीकी गलती करें.
- व्यक्तिगत संबंध राजनीतिक अनुशासन पर भारी पड़ें.
ऐसी स्थिति में मुकाबला पूरी तरह पलट सकता है.
मुख्यमंत्री का मास्टर स्ट्रोक तय करेगा परिणाम
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस चुनाव का अंतिम परिणाम केवल विधायकों की संख्या से तय नहीं होगा बल्कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की संगठनात्मक क्षमता और गठबंधन को एकजुट रखने की रणनीति पर भी निर्भर करेगा.
यदि हेमंत सोरेन अपने पूरे कुनबे को मतदान तक एकजुट रखने में सफल रहते हैं तो यह उनकी बड़ी राजनीतिक जीत होगी और कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा राज्यसभा पहुंच जाएंगे.
लेकिन यदि एक भी बड़ा राजनीतिक सुराख सामने आता है, कुछ वोट इधर-उधर होते हैं या अप्रत्याशित क्रॉस वोटिंग होती है तो परिमल नाथवानी झारखंड की राजनीति का सबसे बड़ा उलटफेर कर सकते हैं.
फिलहाल गणित प्रणव झा के पक्ष में है, लेकिन राजनीति में कई बार केमिस्ट्री गणित को मात दे देती है. यही वजह है कि राज्यसभा की दूसरी सीट का यह चुनाव झारखंड की राजनीति के सबसे रोमांचक मुकाबलों में से एक बन गया है.

