TNP DESK: देश की शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली और सरकारी जवाबदेही को लेकर उठे सवालों के बीच सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधार के पैरोकार सोनम वांगचुक पिछले 19 दिनों से दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं. यह आंदोलन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा शुरू किए गए देशव्यापी अभियान का हिस्सा है, जिसकी मुख्य मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है. आंदोलनकारी आरोप लगा रहे हैं कि NEET समेत विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और अनियमितताओं ने लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित किया, जबकि कई छात्रों ने मानसिक तनाव और निराशा में आत्महत्या तक कर ली.

वांगचुक ने 28 जून को अपना अनशन शुरू किया था. उनका कहना है कि यह लड़ाई किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता स्थापित करने की है. उनका सवाल है कि यदि किसी परीक्षा में गंभीर अनियमितताएं होती हैं, तो उसकी नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी कौन लेगा.
आंदोलन के 19वें दिन तक केंद्र सरकार की ओर से कोई औपचारिक वार्ता शुरू नहीं हुई है. न तो शिक्षा मंत्रालय का कोई प्रतिनिधि वांगचुक से मिलने पहुंचा और न ही सरकार ने उनकी प्रमुख मांगों पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी है. इसी चुप्पी को लेकर आंदोलनकारी लगातार सवाल उठा रहे हैं कि आखिर लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध कर रहे नागरिक से संवाद करने में हिचक क्यों है.

जंतर-मंतर पर पिछले तीन सप्ताह के दौरान कई प्रमुख सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक हस्तियां वांगचुक से मिलने पहुंचीं. लेखक अरुंधति रॉय, सांसद महुआ मोइत्रा, शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे, अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, अभिनेत्री स्वरा भास्कर तथा कई छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों ने उनसे मुलाकात कर आंदोलन का समर्थन किया. सभी ने अलग-अलग शब्दों में यही कहा कि परीक्षा प्रणाली में विश्वास बहाल करने के लिए सरकार को संवाद और जवाबदेही का रास्ता अपनाना चाहिए.

19वें दिन अभिनेता अतुल कुलकर्णी ने भी एक दिन का सांकेतिक उपवास रखने की घोषणा करते हुए सरकार से अपील की कि वह वांगचुक से तत्काल बातचीत शुरू करे. सोशल मीडिया पर भी कई प्रमुख कंटेंट क्रिएटर्स और सार्वजनिक हस्तियों ने उनके समर्थन में आवाज उठाई है.लगातार उपवास के कारण वांगचुक का स्वास्थ्य तेजी से गिरा है. चिकित्सकों के अनुसार उनका वजन लगभग नौ किलोग्राम कम हो चुका है और लंबे उपवास के कारण अंगों पर गंभीर असर पड़ने का खतरा बढ़ रहा है. स्वास्थ्य को लेकर दायर याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने भी गंभीर चिंता जताते हुए उनके नियमित मेडिकल परीक्षण के निर्देश दिए हैं और कहा है कि किसी भी नागरिक का जीवन सर्वोपरि है.
जंतर-मंतर पर वांगचुक अकेले अनशन नहीं कर रहे हैं. कई छात्र और युवा कार्यकर्ता समानांतर भूख हड़ताल पर बैठे हैं. देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और छात्र संगठनों ने भी सांकेतिक उपवास और प्रदर्शन आयोजित कर इस आंदोलन के प्रति एकजुटता दिखाई है. आंदोलन का दायरा अब केवल NEET या एक परीक्षा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, निष्पक्षता और संस्थागत जवाबदेही की व्यापक मांग का प्रतीक बनता जा रहा है.

कॉकरोच जनता पार्टी ने संसद के मानसून सत्र के दौरान बड़े पैमाने पर प्रदर्शन और जनभागीदारी का आह्वान किया है. दूसरी ओर, वांगचुक ने स्पष्ट किया है कि जब तक उनकी प्रमुख मांगों पर सार्थक पहल नहीं होती, तब तक वे अपना अनशन जारी रखेंगे.
19 दिन बीत जाने के बाद भी सबसे बड़ा सवाल वही है क्या लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़े इस मुद्दे पर सरकार संवाद का रास्ता चुनेगी, या फिर लोकतांत्रिक विरोध की यह आवाज भी सरकारी चुप्पी के बीच अनसुनी रह जाएगी? फिलहाल जंतर-मंतर पर एक व्यक्ति का उपवास देश की शिक्षा व्यवस्था और उसकी जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन चुका है.

