टीएनपी डेस्क(TNP DESK): भारत अपनी रक्षा ताकत को और मजबूत करने की तैयारी में है. इसके लिए भारत अमेरिका से 31 अत्याधुनिक MQ-9 रीपर ड्रोन खरीद रहा है. इन ड्रोन के आने से भारतीय सेना की निगरानी क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी. खासकर चीन और पाकिस्तान से लगती सीमाओं के साथ-साथ हिंद महासागर में होने वाली हर गतिविधि पर पहले से ज्यादा नजर रखी जा सकेगी.
तीनों सेनाओं को मिलेंगे रीपर ड्रोन
इस रक्षा सौदे के तहत भारतीय नौसेना को 15 रीपर ड्रोन दिए जाएंगे. वहीं थल सेना और वायु सेना को 8-8 ड्रोन मिलेंगे. नौसेना को सबसे ज्यादा ड्रोन इसलिए दिए जा रहे हैं क्योंकि हिंद महासागर में भारत की सुरक्षा और रणनीतिक मौजूदगी काफी अहम है. इन ड्रोन की मदद से समुद्र में दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रखी जा सकेगी.
क्या है MQ-9 रीपर ड्रोन की सबसे बड़ी खासियत
MQ-9 रीपर दुनिया के सबसे एडवांस ड्रोन में गिना जाता है. इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी लंबी उड़ान है. यह लगातार 40 घंटे से ज्यादा समय तक हवा में रह सकता है. यह सैटेलाइट से जुड़ा होता है, इसलिए इसे हजारों किलोमीटर दूर बैठकर भी ऑपरेट किया जा सकता है. यह दिन और रात, दोनों समय हर मौसम में निगरानी करने में सक्षम है.
भारत को कैसे मिलेगा फायदा
भारत इन ड्रोन का इस्तेमाल मुख्य रूप से सीमाओं और हिंद महासागर की निगरानी के लिए करेगा. अगर किसी इलाके में घुसपैठ, संदिग्ध गतिविधि या दुश्मन की कोई हलचल होती है, तो सेना को तुरंत जानकारी मिल जाएगी. इससे समय रहते कार्रवाई करना आसान होगा. लंबे समय तक एक ही इलाके पर नजर रखने की क्षमता इन ड्रोन को बेहद खास बनाती है.

युद्ध में भी साबित कर चुका है अपनी ताकत
अमेरिका कई सालों से इराक, अफगानिस्तान, सीरिया और यमन जैसे देशों में MQ-9 रीपर ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा है. इन ड्रोन ने आतंकवाद विरोधी अभियानों और निगरानी मिशनों में अहम भूमिका निभाई है. हालांकि हाल के पश्चिम एशिया संघर्ष में ईरान ने कई अमेरिकी रीपर ड्रोन को मार गिराया. आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम के सामने इन्हें भी चुनौती मिलती है, लेकिन निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने के मामले में इनकी अहमियत आज भी बरकरार है.
भारत में ही असेंबल होंगे ज्यादातर ड्रोन
इस सौदे की एक बड़ी खासियत यह है कि 31 में से 21 रीपर ड्रोन भारत में ही असेंबल किए जाएंगे. सिर्फ 10 ड्रोन अमेरिका से पूरी तरह तैयार हालत में आएंगे. इसके अलावा करीब 34 प्रतिशत उपकरण भी भारत में ही तैयार किए जाएंगे. इससे रक्षा क्षेत्र में 'मेक इन इंडिया' और आत्मनिर्भर भारत अभियान को मजबूती मिलेगी.
DRDO को भी मिलेगा तकनीकी सहयोग
इस रक्षा समझौते के तहत अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक्स, डीआरडीओ को आधुनिक ड्रोन तकनीक विकसित करने में मदद करेगी. इससे भारत को भविष्य में स्वदेशी ड्रोन बनाने में फायदा मिलेगा और रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा.
हथियारों से भी है लैस
MQ-9 रीपर सिर्फ निगरानी करने वाला ड्रोन नहीं है. इसमें हाई-रिजॉल्यूशन कैमरे, थर्मल इमेजिंग सिस्टम, एडवांस सेंसर और रडार लगे होते हैं. जरूरत पड़ने पर इसमें हेलफायर मिसाइल, लेजर गाइडेड बम और दूसरे आधुनिक हथियार भी लगाए जा सकते हैं. हालांकि भारत इनका इस्तेमाल मुख्य रूप से निगरानी और खुफिया मिशनों के लिए करेगा.
2029 से शुरू होगी डिलीवरी
इन ड्रोन की डिलीवरी वर्ष 2029 से शुरू होने की उम्मीद है. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इनके शामिल होने के बाद भारतीय सेना की निगरानी क्षमता, खुफिया जानकारी जुटाने की ताकत और समुद्री सुरक्षा पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो जाएगी. बदलते सुरक्षा माहौल में यह सौदा भारत की रक्षा तैयारियों को नई मजबूती देने वाला माना जा रहा है.
