Gandhi Jayanti Special: मोहन दास गांधी से महात्मा गांधी और बापू बनने तक की पूरी कहानी
“बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत कहो.” गांधी से जुड़ी तीन बंदरों की यह सीख आज भी लोगों के बीच लोकप्रिय है. उन्होंने अन्याय का विरोध किया, लेकिन हिंसा को संघर्ष का रास्ता नहीं माना. आज 2 अक्टूबर 2026 को पूरा देश गांधी की 157वीं जयंती मना रहा. पीएम मोदी ने राजघाट पहुंचकर गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित कर उनके बलिदानों को याद किया.
टीनपी डेस्क (TNP DESK): “बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत कहो.” गांधी से जुड़ी तीन बंदरों की यह सीख आज भी लोगों के बीच लोकप्रिय है. लेकिन गांधी के लिए यह केवल कहने-सुनने की बात नहीं थी. उनके जीवन में सत्य, आत्मसंयम और अहिंसा व्यवहार का हिस्सा रहे. उन्होंने अन्याय का विरोध किया, लेकिन हिंसा को संघर्ष का रास्ता नहीं माना. उनके जीवन को समझने के लिए उनके जन्म, आंदोलनों, जेल यात्राओं और अंतिम समय को साथ देखना जरूरी है. आज 2 अक्टूबर 2026 को पूरा देश गांधी की 157वीं जयंती मना रहा. पीएम मोदी ने राजघाट पहुंचकर गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित कर उनके बलिदानों को याद किया.

पोरबंदर में जन्म
महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था. उनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था. उनके पिता करमचंद गांधी रियासत में प्रशासनिक पद पर थे, जबकि उनकी मां पुतलीबाई धार्मिक और अनुशासित जीवन के लिए जानी जाती थीं. बचपन में मिले संस्कारों ने गांधी के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डाला. कानून की पढ़ाई के लिए वे इंग्लैंड गए और बैरिस्टर बनकर भारत लौटे. इसके बाद 1893 में वे एक कानूनी मामले के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका गए. वहां भारतीयों के साथ होने वाले नस्लीय भेदभाव ने उनके जीवन की दिशा बदल दी.

दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह की शुरुआत
दक्षिण अफ्रीका में गांधी ने भारतीयों के अधिकारों के लिए संघर्ष शुरू किया. 1906 में उन्होंने पहली बार सत्याग्रह का प्रयोग किया. उनका तरीका हिंसा पर नहीं, बल्कि सत्य, अनुशासन और शांतिपूर्ण विरोध पर आधारित था. दक्षिण अफ्रीका में उनके संघर्ष के दौरान उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया. भारत सरकार के गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति और गांधी हेरिटेज पोर्टल के अभिलेखों के अनुसार, दक्षिण अफ्रीका में उनकी कई गिरफ्तारियां और जेल यात्राएं हुईं.

भारत लौटे और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े
गांधी 1915 में भारत लौटे. उन्होंने पहले देश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर किसानों, मजदूरों और आम लोगों की समस्याओं को समझा. 1917 का चंपारण सत्याग्रह, 1918 का खेड़ा आंदोलन और अहमदाबाद मिल मजदूरों का संघर्ष उनके शुरुआती महत्वपूर्ण आंदोलनों में शामिल रहे. इसके बाद वे राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए.

असहयोग से भारत छोड़ो आंदोलन तक
1920 में गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ. उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी को बढ़ावा दिया. 1922 में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद उन्होंने आंदोलन वापस ले लिया, क्योंकि वे स्वतंत्रता के संघर्ष में हिंसा को स्वीकार नहीं करते थे. इसके बाद 1930 का दांडी मार्च और नमक सत्याग्रह गांधी के सबसे चर्चित आंदोलनों में शामिल हुआ. उन्होंने नमक कानून के विरोध में साबरमती से दांडी तक पैदल यात्रा की. 1942 में उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व किया और “करो या मरो” का आह्वान किया.

गांधी कितनी बार जेल गए?
गांधी की जेल यात्राओं की संख्या अलग-अलग तरीके से गिनी जा सकती है, क्योंकि कुछ अभिलेख अलग-अलग गिरफ्तारी और एक ही जेल अवधि के चरणों को अलग प्रविष्टियों में दर्ज करते हैं. गांधी हेरिटेज पोर्टल की सूची में दक्षिण अफ्रीका की 9 और भारत की 10 जेल-प्रविष्टियां दर्ज हैं. भारत में उनकी प्रमुख जेल यात्राओं में 1922 का राजद्रोह मुकदमा, 1930 का नमक सत्याग्रह, 1932-33 की गिरफ्तारी और 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन शामिल हैं. 1942 में गिरफ्तारी के बाद उन्हें आगा खान पैलेस में रखा गया था.
अहिंसा थी संघर्ष का आधार
गांधी के लिए आंदोलन का उद्देश्य जितना महत्वपूर्ण था, उसे पाने का रास्ता भी उतना ही महत्वपूर्ण था. वे मानते थे कि अन्याय का विरोध जरूरी है, लेकिन विरोध हिंसा और नफरत में नहीं बदलना चाहिए. इसी सोच ने सत्याग्रह और अहिंसा को उनके राजनीतिक संघर्ष का आधार बनाया.

30 जनवरी 1948 को हुई हत्या
भारत को 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिली, लेकिन देश विभाजन के बाद सांप्रदायिक हिंसा से गुजर रहा था. गांधी ने अपने अंतिम दिनों में भी शांति और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए प्रयास किए. 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली में प्रार्थना सभा के लिए जाते समय नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या कर दी. गांधी का जीवन वहीं समाप्त हुआ, लेकिन उनके विचारों पर बहस जारी रही. “बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो” को उनके जीवन के व्यापक संदेश से जोड़कर देखें तो यह केवल तीन वाक्य नहीं, बल्कि अपने विचार, शब्द और व्यवहार पर नियंत्रण रखने की सीख है. सत्य, अहिंसा और आत्मसंयम के जरिए अन्याय का सामना करने का उनका तरीका आज भी इतिहास और सार्वजनिक जीवन में चर्चा का विषय बना हुआ है.