आजादी के ढाई साल बाद तक देश में नहीं था राष्ट्रपति का पद, फिर किसने संभाली देश की बागडोर? पढ़िए पूरी कहानी

आजादी के ढाई साल बाद तक देश में नहीं था राष्ट्रपति का पद, फिर किसने संभाली देश की बागडोर? पढ़िए पूरी कहानी

टीएनपी डेस्क(TNP DESK):राष्ट्रपति का पद देश में सर्वोच्च पद होता है, यानी देश का सबसे बड़ा पद. उसके अधीन ही प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के सभी लोग काम करते हैं. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि जब हमारा देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ, तब देश में राष्ट्रपति का पद था ही नहीं. यह बात सुनकर थोड़ी अटपटी लग सकती है, लेकिन हमारा देश आजादी के बाद भी पूरी तरह से गणतंत्र नहीं हुआ था. 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक हमारा देश बिना राष्ट्रपति के ही काम कर रहा था. इस दौरान भारत एक डोमिनियन के रूप में काम करता था. उस समय ब्रिटेन के राजा किंग जॉर्ज षष्ठम भारत के संवैधानिक प्रमुख थे और भारत में उनका प्रतिनिधि गवर्नर-जनरल काम करता था. अब आपको लगता है कि हमारा देश आजाद होने के बावजूद ब्रिटिश शासन के अधीन था, तो यह बात बिल्कुल गलत है, क्योंकि उस समय ब्रिटेन के राजा किंग जॉर्ज षष्ठम भारत के संवैधानिक प्रमुख थे और भारत में उनका प्रतिनिधि गवर्नर-जनरल काम करता था.

आजादी के बाद कौन संभाल रहा था देश की बागडोर

आजादी के बाद देश की पूरी बागडोर भारतीय नेताओं के हाथ में थी, जहां जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में देश संभाल रहे थे. हमारा देश पूरी तरह से शासन से आजाद था, लेकिन उस समय राष्ट्रपति वाला गणतांत्रिक ढांचा लागू नहीं हुआ था, जिसकी वजह से करीब ढाई साल तक हमारा देश बिना राष्ट्रपति के ही चलता रहा. आजादी के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी अपना संविधान तैयार करना था. संविधान सभा इस काम में शामिल हुई थी और देश के भविष्य की शासन व्यवस्था पर लगातार चर्चा भी हो रही थी. उस समय राष्ट्रपति का पद नहीं था और गवर्नर-जनरल देश के संवैधानिक प्रमुख के रूप में काम करता था. संविधान सभा में यह तय किया गया कि भारत में लोकतांत्रिक और संसदीय शासन व्यवस्था होगी, जहां संविधान सभा में राष्ट्रपति को देश का संवैधानिक प्रमुख बनाया गया, जबकि प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद को सरकार चलाने की जिम्मेदारी मिली. इस पूरी प्रक्रिया में डॉ. भीमराव आंबेडकर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और संविधान सभा के अन्य सदस्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही.

आखिर क्यों संविधान लागू करने के लिए चुना गया 26 जनवरी की तारीख

साल 1949 में 26 नवंबर को संविधान सभा ने भारत के संविधान को अपनाया, लेकिन इसे उसी दिन लागू नहीं किया गया. संविधान को लागू करने के लिए 26 जनवरी 1950 की तारीख चुनी गई. इस तारीख के पीछे स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण इतिहास है, जहां 26 जनवरी 1930 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य का संकल्प लिया था. इसलिए संविधान लागू करने के लिए इसी ऐतिहासिक तारीख को चुना गया. साल 1950 में 26 जनवरी को भारत का संविधान लागू हुआ और इसी दिन भारत गणराज्य बन गया. इसके बाद ही गवर्नर-जनरल का पद समाप्त करके देश में राष्ट्रपति का पद अस्तित्व में आया. यानी भारत को 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से आजादी मिली, लेकिन 26 जनवरी 1950 को भारत ने खुद को एक गणराज्य के रूप में स्थापित किया. यही वजह है कि 15 अगस्त और 26 जनवरी का अपना अलग-अलग महत्व है.

पहले राष्ट्रपति के रूप में डॉ राजेंद्र प्रसाद ने संभाला पद

जहां 15 अगस्त हमें स्वतंत्रता दिवस की याद दिलाता है, वहीं 26 जनवरी को हमें संविधान की याद आती है, जिसके आधार पर आज देश चल रहा है. आजादी और गणराज्य बनने के बीच का यह सफर भारत के इतिहास का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है. 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ, लेकिन उस समय भारत में राष्ट्रपति का पद नहीं था. 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद भारत गणराज्य बना और राष्ट्रपति का पद अस्तित्व में आया. जहां पहली बार डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली.इस तरह स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस दोनों ही भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं और दोनों का अपना अलग ऐतिहासिक महत्व है.