टीएनपी डेस्क(TNP DESK): तमिलनाडु पुलिस ने महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों पर लगाम लगाने के लिए एक नई पहल शुरू की है. इस पहल का नाम 'स्पेक्ट्रम' प्रोजेक्ट रखा गया है. इसका मकसद केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई करना नहीं, बल्कि ऐसे अपराधियों पर पहले से नजर रखना है, ताकि वे दोबारा किसी वारदात को अंजाम न दे सकें. फिलहाल इस प्रोजेक्ट को राज्य के दक्षिणी हिस्से के 10 जिलों में लागू किया गया है. इनमें मदुरै, तिरुनेलवेली, तूतीकोरिन और कन्याकुमारी जैसे जिले शामिल हैं.
इस नई व्यवस्था की सबसे खास बात यह है कि अब सभी यौन अपराधियों को एक जैसी नजर से नहीं देखा जाएगा. पुलिस अपराध की गंभीरता और आरोपी के पुराने रिकॉर्ड के आधार पर तय करेगी कि किस पर कितनी निगरानी रखनी है. उदाहरण के लिए, गैंगरेप के आरोपी, बार-बार रेप करने वाले अपराधी या पॉक्सो एक्ट के तहत कई मामलों में शामिल लोगों को सबसे ज्यादा जोखिम वाली श्रेणी में रखा जाएगा. वहीं पहली बार किसी मामले में आरोपी बने व्यक्ति या कम गंभीर मामलों के आरोपियों के लिए अलग व्यवस्था होगी.
पुलिस के अनुसार दक्षिणी तमिलनाडु में हर साल करीब 1,500 से 2,000 यौन अपराध के मामले दर्ज होते हैं. इनमें कुछ मामले ऐसे भी होते हैं, जिनमें दोनों पक्षों की सहमति से रिश्ता होता है, लेकिन लड़की के नाबालिग होने के कारण पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज हो जाता है. दूसरी तरफ कई ऐसे अपराधी भी हैं, जो बार-बार महिलाओं का पीछा करते हैं, छेड़छाड़ करते हैं या गंभीर अपराधों में शामिल रहते हैं. ऐसे लोगों पर अब पहले से ज्यादा सख्त नजर रखी जाएगी.
स्पेक्ट्रम प्रोजेक्ट के तहत पुलिस ने करीब 15,000 आरोपियों की पहचान की है. इन सभी को अलग-अलग रंगों वाली आठ श्रेणियों में बांटा गया है. सबसे खतरनाक अपराधियों को रेड कैटेगरी में रखा गया है. इसमें गैंगरेप के आरोपी, सीरियल रेपिस्ट और बार-बार पॉक्सो कानून का उल्लंघन करने वाले लोग शामिल हैं. ऑरेंज कैटेगरी में ऐसे लोग रखे गए हैं, जो लगातार महिलाओं का पीछा करते हैं, छेड़छाड़ करते हैं या उन्हें परेशान करते रहते हैं. वहीं साइबर अपराध से जुड़े आरोपियों के लिए ब्लू कैटेगरी बनाई गई है. इसमें ऑनलाइन ग्रूमिंग, सेक्सटॉर्शन और साइबर स्टॉकिंग जैसे मामलों में शामिल लोग रखे गए हैं. इसके अलावा संगठित सेक्स रैकेट और मानव तस्करी से जुड़े मामलों के लिए ब्लैक कैटेगरी बनाई गई है, जबकि नाबालिग आरोपियों को सिल्वर कैटेगरी में रखा गया है, जहां सुधार और काउंसलिंग पर ज्यादा जोर दिया जाएगा.
इस प्रोजेक्ट के तहत पुलिस केवल रिकॉर्ड तैयार नहीं कर रही, बल्कि आरोपियों के बायोमेट्रिक डेटा भी इकट्ठा कर रही है. इसमें फिंगरप्रिंट, आइरिस स्कैन, हथेली के निशान, लंबाई और हाई क्वालिटी तस्वीरें शामिल हैं. भविष्य में अगर कोई नया या अनसुलझा मामला सामने आता है तो इन रिकॉर्ड की मदद से जांच को तेज किया जा सकेगा. इसके साथ ही पुलिस कुछ हाई रिस्क आरोपियों के पैरोल, जमानत और उनकी गतिविधियों पर भी लगातार नजर रख रही है. जरूरत पड़ने पर उनसे कानूनी बॉन्ड भी भरवाए जा रहे हैं ताकि दोबारा अपराध करने की संभावना कम हो सके.
तमिलनाडु पुलिस का मानना है कि केवल अपराध होने के बाद गिरफ्तारी करना काफी नहीं है. अपराधियों की पहचान, उनकी प्रोफाइलिंग और लगातार निगरानी ही भविष्य में ऐसे मामलों को कम करने का प्रभावी तरीका है. अगर यह मॉडल सफल रहता है तो आने वाले समय में इसे राज्य के दूसरे जिलों में भी लागू किया जा सकता है. इससे महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को और मजबूत बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है.
