टीएनपी डेस्क (TNP DESK): कोयला उद्योग बदलाव की ओर बढ़ चला है. हाल के दिनों में कई बदलाव देखे जा सकते हैं. कोयले की खदानों से गैस निकलेगी. दरअसल, जिन कोलियारियों में कोयला बहुत नीचे पहुंच गया है और अब उसे निकालना आसान भी नहीं है और प्रक्रिया भी महंगी है, तो इस कोयले से सीधे गैस बनाई जाएगी. कोल इंडिया ने भी भविष्य में कोयले के बेहतर उपयोग को लेकर तैयारी शुरू कर दी है. कोल इंडिया तीन प्रमुख पीएसयू के साथ तीन बड़े गैसीकरण प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया है.
तीन पीएसयू के साथ कोल इंडिया का एमओयू
जानकारी के अनुसार जिन तीन पीएसयू के साथ कोल इंडिया का पूर्व में मेमोरेंडम आफ अंडरस्टैंडिंग हुआ है, उनमें गेल, भेल और बीपीसीएल शामिल है. इन पीएसयू के साथ ज्वाइंट वेंचर में काम आगे बढ़ चुका है. दरअसल, पश्चिम एशिया संकट ने भारत के सामने ऊर्जा की चुनौतियां खड़ी कर दी है. उससे निपटने के लिए अलग-अलग प्रयास किये जा रहे हैं. इसी के तहत गैस की कमी को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला किया है. सरकार ने कोयला से गैस बनाने के प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है. कोल् गैसीफिकेशन से देश में कोयले के डिमांड में भी बढ़ोतरी होगी. केंद्र सरकार ने इस योजना को बढ़ाने के लिए 37,500 करोड़ की प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी है.
2030 तक का लक्ष्य कर दिया गया है निर्धारित
लक्ष्य 2030 तक 100 मिलियन टन कोयले का गैसीफिकेशन करना है. कोल् गैसीफिकेशन से कोयला सेक्टर में बड़े बदलाव की संभावना है. भारत में फिलहाल कोयल का अधिक उपयोग बिजली उत्पादन में होता है. दरअसल, इस योजना के तहत कोयले को सीधे जलाने के बजाय गैस में परिवर्तित कर दिया जाएगा. इस गैस का उपयोग मेथेनॉल, अमोनिया तथा अन्य आवश्यक केमिकल और ईंधन बनाने में किया जा सकता है. सरकार की ओर से आयातित गैस पर निर्भरता कम करने घरेलू कोयले से ईंधन बनाने के लिए कई प्रोजेक्ट लगाए जा रहे हैं.
रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे और निर्भरता भी कमेगी
इन प्रोजेक्ट से रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे, इस प्रोजेक्ट से क़रीब 50,000 लोगों को रोज़गार भी मिल सकता है. फिलहाल भारत को अपनी एलएनजी आवश्यकता का करीब 50 फ़ीसदी, यूरिया का 20 फ़ीसदी, अमोनिया का करीब 100 फ़ीसदी जबकि मेथनॉल का करीब 90 फीसदी आयात करना पड़ता है. देश में फर्टिलाइजर के उत्पादन के लिए इन सभी चीज़ों की ज़रूरत पड़ती है. कोयला से गैस बनाने के प्रोजेक्ट से इन सभी चीज़ों के आयात को कम करने में मदद मिलेगी और गैस के लिए आयात पर निर्भरता काफ़ी हद तक कम हो जाएगी.