टीनपी डेस्क (TNP DESK): देश में जैसे-जैसे लोग डिजिटल दुनिया को अपना रहे है वैसे-वैसे परेशानियाँ भी बढ़ती जा रही है. यूं कहे तो देश में डिजिटल लेनदेन जितनी तेजी से बढ़ा है, साइबर अपराध भी उतनी ही तेजी से बढ़े हैं. पिछले कुछ वर्षों में "डिजिटल अरेस्ट" और ऑनलाइन ठगी के मामलों में लगातार इजाफा देखने को मिला है. ठग खुद को पुलिस अधिकारी, सीबीआई, ईडी, आयकर विभाग, ट्राई या किसी बैंक का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं और फिर उनके बैंक खाते से पैसे ठग लेते हैं. कई बार लोग डर और घबराहट में ठगों की बातों पर विश्वास कर लेते हैं और भारी आर्थिक नुकसान झेलते हैं. साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि थोड़ी सी सतर्कता और सही जानकारी से इस तरह की धोखाधड़ी से आसानी से बचा जा सकता है.

क्या होता है डिजिटल अरेस्ट?
डिजिटल अरेस्ट एक साइबर ठगी का तरीका है, जिसमें अपराधी वीडियो कॉल, फोन कॉल या मैसेज के जरिए खुद को किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताते हैं. वे दावा करते हैं कि आपके आधार कार्ड, बैंक खाते या मोबाइल नंबर का इस्तेमाल किसी अपराध में हुआ है. इसके बाद गिरफ्तारी, जेल या कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर पीड़ित को घंटों वीडियो कॉल पर रोके रखते हैं और किसी से बात न करने की चेतावनी देते हैं. फिर जांच के नाम पर बैंक खाते की जानकारी लेकर या पैसे "वेरिफिकेशन" के बहाने दूसरे खाते में ट्रांसफर करवा लेते हैं.
ऑनलाइन ठगी के आम तरीके
आजकल साइबर अपराधी कई नए तरीकों से लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं. इनमें फर्जी बैंक कॉल, केवाईसी अपडेट के नाम पर ठगी, ओटीपी और यूपीआई पिन मांगना, फर्जी निवेश योजनाएं, पार्ट-टाइम जॉब का लालच, फर्जी ई-कॉमर्स वेबसाइट, सोशल मीडिया अकाउंट हैकिंग और व्हाट्सएप पर रिश्तेदार बनकर पैसे मांगने जैसी घटनाएं शामिल हैं. इसके अलावा फिशिंग लिंक और नकली मोबाइल ऐप के जरिए भी लोगों का बैंक डेटा और निजी जानकारी चोरी की जा रही है.

साइबर एक्सपर्ट क्या सलाह देते हैं?
साइबर विशेषज्ञों के अनुसार, कोई भी सरकारी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर किसी व्यक्ति को डिजिटल अरेस्ट नहीं करती. यदि कोई व्यक्ति खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी या किसी अन्य सरकारी विभाग का अधिकारी बताकर पैसे मांगता है या डराने की कोशिश करता है, तो उसकी बातों पर तुरंत भरोसा न करें. किसी भी अनजान व्यक्ति के साथ अपना ओटीपी, यूपीआई पिन, सीवीवी, बैंक पासवर्ड या आधार से जुड़ी गोपनीय जानकारी साझा न करें. किसी भी संदिग्ध लिंक पर क्लिक करने से बचें और केवल आधिकारिक वेबसाइट या ऐप का ही उपयोग करें.

ठगी से बचने के आसान उपाय
- किसी भी अनजान कॉल या वीडियो कॉल से घबराएं नहीं.
- ओटीपी, यूपीआई पिन, एटीएम पिन और बैंक पासवर्ड कभी किसी से साझा न करें.
- मोबाइल और बैंकिंग ऐप में टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (2FA) का इस्तेमाल करें.
- संदिग्ध लिंक, ईमेल या क्यूआर कोड स्कैन करने से बचें.
- बैंक खाते और यूपीआई ट्रांजैक्शन का नियमित रूप से रिकॉर्ड जांचते रहें.
- सोशल मीडिया पर अपनी निजी जानकारी सीमित रखें.
- केवल आधिकारिक ऐप स्टोर से ही मोबाइल ऐप डाउनलोड करें.

ठगी का शिकार होने पर क्या करें?
यदि आपके साथ ऑनलाइन ठगी हो जाती है, तो सबसे पहले अपने बैंक को तुरंत सूचना दें और खाते या कार्ड को ब्लॉक कराएं. इसके बाद राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर तुरंत कॉल करें या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें. जितनी जल्दी शिकायत दर्ज होगी, ठगे गए पैसे वापस मिलने की संभावना उतनी अधिक हो सकती है. साथ ही अपने पास मौजूद कॉल रिकॉर्ड, स्क्रीनशॉट, बैंक ट्रांजैक्शन और अन्य सबूत सुरक्षित रखें.
सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव
डिजिटल दुनिया में सुविधा के साथ जोखिम भी बढ़े हैं. ऐसे में जागरूक रहना, किसी भी संदिग्ध कॉल या संदेश की पुष्टि करना और साइबर सुरक्षा के बुनियादी नियमों का पालन करना बेहद जरूरी है. याद रखें, कोई भी सरकारी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर पैसे ट्रांसफर करने या गोपनीय बैंकिंग जानकारी साझा करने के लिए नहीं कहती. थोड़ी सी सावधानी आपको बड़ी आर्थिक ठगी और मानसिक तनाव से बचा सकती है.

