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Read Nowटीएनपी डेस्क (TNP DESK): डॉक्टर बनने का सपना देश के लाखों युवाओं की आंखों में बसता है. हर साल करीब लाखों छात्र-छात्राएं NEET जैसी मुश्किल परीक्षा की तैयारी में दिन-रात एक कर देते हैं. लेकिन जब इस सपने के साथ जुड़ जाती है परीक्षा विवाद और पेपर लीक की खबरें, साथ ही लगातार बढ़ता सामाजिक दबाव, तब कई बार यह संघर्ष मानसिक, पीड़ा में बदल जाता है. झारखंड के कोडरमा में NEET-UG की तैयारी कर रही छात्रा रुचि कुमारी की आत्महत्या की घटना ने एक बार फिर देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव छात्रों को किस हद तक प्रभावित कर रहा है.
कोडरमा की घटना ने खड़े किए गंभीर सवाल
तिलैया थाना क्षेत्र के चित्रगुप्त नगर में रहने वाली रुचि कुमारी ने कथित रूप से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. परिजनों का कहना है कि उसने इस वर्ष NEET-UG परीक्षा दी थी और उसका पेपर अच्छा गया था, लेकिन परीक्षा रद्द होने और उससे जुड़ी खबरों के बाद वह मानसिक तनाव में रहने लगी थी. हालांकि पुलिस जांच जारी है और आत्महत्या के कारणों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है.
NEET विवाद और बढ़ती बेचैनी
पिछले कुछ वर्षों में NEET परीक्षा कई विवादों के केंद्र में रही है. 2024 में पेपर लीक और परिणाम संबंधी विवादों ने देशभर में छात्रों के बीच असमंजस पैदा किया था. इस मामले में जांच एजेंसियों की जांच और न्यायिक सुनवाई भी हुई. वहीं 2026 में भी कथित पेपर लीक को लेकर विवाद सामने आया, जिसके बाद परीक्षा रद्द करने, दोबारा परीक्षा कराने और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर देशभर में बहस छिड़ी रही. राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) को सुप्रीम कोर्ट में भी जवाब देना पड़ा और री-एग्जाम को लेकर विशेष सुरक्षा उपायों की जानकारी देनी पड़ी.
पहले भी सामने आ चुके हैं दर्दनाक मामले
कोडरमा की घटना कोई अकेली घटना नहीं है. राजस्थान का कोटा, जो NEET और JEE कोचिंग का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है, पिछले कुछ वर्षों में छात्र आत्महत्याओं के कारण लगातार चर्चा में रहा है. शोध और रिपोर्टों के अनुसार 2023 में कोटा में 28 छात्रों ने आत्महत्या की थी. 2024 और 2025 में भी कई ऐसे मामले सामने आए, जिन्होंने शिक्षा व्यवस्था और मानसिक स्वास्थ्य पर सवाल खड़े किए. हाल ही में राजस्थान के सीकर में भी एक NEET अभ्यर्थी की आत्महत्या का मामला चर्चा में रहा, जहां परीक्षा रद्द होने के बाद छात्र के मानसिक तनाव में होने की बात सामने आई थी.
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
मनोवैज्ञानिकों और शिक्षाविदों का मानना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं होता. इसके साथ परिवार की अपेक्षाएं, आर्थिक चुनौतियां, भविष्य की चिंता, सोशल मीडिया पर तुलना और लगातार सफलता हासिल करने का दबाव भी जुड़ जाता है. हाल के अध्ययनों में पाया गया है कि कोचिंग और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले बड़ी संख्या में छात्र उच्च स्तर के शैक्षणिक तनाव का सामना करते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार लगातार तनाव, नींद की कमी, असफलता का डर और अकेलापन मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि छात्रों के लिए नियमित काउंसलिंग, भावनात्मक सहयोग, मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता बेहद जरूरी है. परिवारों को भी केवल परिणाम पर नहीं, बल्कि बच्चों की मानसिक स्थिति पर ध्यान देना चाहिए. प्रतियोगी परीक्षा जीवन का एक हिस्सा है, पूरी जिंदगी नहीं. कोडरमा की छात्रा की मौत की जांच अभी जारी है, लेकिन यह घटना एक बार फिर उस बड़ी समस्या की ओर इशारा करती है, जिस पर समाज, शिक्षा संस्थानों और सरकारों को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है. सवाल सिर्फ एक परीक्षा का नहीं, बल्कि उन लाखों सपनों का है जो सफलता की दौड़ में कहीं मानसिक दबाव के बोझ तले टूट रहे हैं.