बांकीपुर की पिच पर कौन फंसा, कैसे -कैसे बदलनी पड़ी रणनीति, जातीय समीकरण में कैसे लगी सेंध, पढ़िए विस्तार से 

बांकीपुर की पिच पर कौन फंसा, कैसे -कैसे बदलनी पड़ी रणनीति, जातीय समीकरण में कैसे लगी सेंध, पढ़िए विस्तार से

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): बिहार के बहुचर्चित और बहु प्रतिष्ठित बांकीपुर उपचुनाव काउंटिंग  की उल्टी गिनती शुरू हो गई है. 3 अगस्त को मतगणना होगी. इसके पहले ही माहौल पूरी तरह से गर्म हो गया है. कौन जीतेगा, कौन हारेगा, इसका खुलासा तो सोमवार दोपहर के बाद होगा. लेकिन उसके पहले जो कुछ हुआ और हो रहा है, यह चर्चा में है. शनिवार को जनसुराज के प्रशांत किशोर ने चुनाव आयोग से पटना के एसएसपी की तथ्यों के साथ शिकायत की. आरोप लगाया कि जनसुराज के 50 से अधिक लोगों को पुलिस ने बगैर किसी दोष  के उठा लिया और तब छोड़ा, जब वोटिंग खत्म हो गई थी.  

रविवार को उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इसके सबूत भी पेश किये. दरअसल, बांकीपुर चुनाव में भाजपा और जनसुराज आमने-सामने थे. यह बात भी सच है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में बुरी तरह से पराजित होने के बाद प्रशांत किशोर ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. नतीजा हुआ है कि बांकीपुर में जनसुराज  ताकत के साथ दिखी. भाजपा जैसे राष्ट्रीय और मजबूत दल के कार्यकर्ताओं से सभी बूथों पर जनसुराज के कार्यकर्ता लड़ते -झगड़ते दिखे. इधर, प्रशांत किशोर ने पटना एसएसपी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. बांकीपुर उप चुनाव की वोटिंग देखने के बाद ऐसा कहा जा सकता है कि प्रशांत किशोर अब जमीनी कार्यकर्ताओं के भरोसे राजनीति करना चाहते है.  

लोग बताते हैं कि जीत-हार जिसकी भी हो, लेकिन जन सुराज ने राजनीतिक दल के रूप में लोगों को प्रभावित किया है. भाजपा के लिए इस प्रतिष्ठित सीट पर प्रशांत किशोर ने पूरी दमकम से लड़ाई लड़ी. भाजपा पिछले 30 सालों के इतिहास में पहली बार अपनी सीट पर असहज महसूस कर रही थी. यह बात भी सच है कि जहां विवाद और झगड़े की बात हुई, वहां जनसुराज  के कार्यकर्ता बराबरी पर डटे रहे. पुलिस भी जनसुराज  को परेशान करती दिखी बावजूद कार्यकर्ता टस से मस नहीं हुए. प्रशांत किशोर ने अपने साथियों के साथ देर रात थाने में बैठकर कार्यकर्ताओं के लिए लड़ाई लड़ी और इसके साथ ही एक बड़ा संदेश देने का प्रयास किया कि कार्यकर्ताओं के हर चुनौती का सामना करने के लिए वह सक्षम हैं. 

2025 के विधानसभा चुनाव की तरह काम नहीं हुआ. काम में बदलाव आया, जमीनी कार्यकर्ताओं की टीम पर प्रशांत किशोर ने भरोसा किया. वह खुद ज्यादा सक्रिय रहे. हर बूथ पर भरोसे के एजेंट और कार्यकर्ताओं की टीम बनाई और यह टीम भाजपा कार्यकर्ताओं से हर जगह लड़ती दिखी. यह अलग बात है कि भाजपा ने इस सीट पर काफी मेहनत की. 40 स्टार प्रचारक को उतारा, नेताओं को उतारा, लोगों को समझाने की कोशिश की, लेकिन कहीं-कहीं वोटर सवाल-जवाब करते भी दिखे. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन भी दिल्ली से पटना आते जाते रहे. उन्हीं के राज्यसभा जाने के बाद यह सीट खाली हुई है. 

फिर से भाजपा के पास लौटी तब तो प्रतिष्ठा बचेगी अन्यथा बांकीपुर सीट की चर्चा आगे भी होती रहेगी. बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बना है. सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार में पहला उप चुनाव भी हुआ है. ऐसे में आगे की राजनीति क्या होगी, यह देखने वाली बात होगी. लेकिन बांकीपुर उपचुनाव में यह  तो साफ दिखा कि राजद अब कमजोर पड़ गया है. शुरुआती दिनों में भाजपा यह प्रचार करती रही कि उसका मुकाबला राजद से है. जनसुराज का नाम लेने से वह बचती रही, लेकिन चुनाव के अंत अंत तक सब कुछ बदला हुआ था. तेजस्वी यादव के चुनाव प्रचार का भी बहुत असर नहीं हुआ. जातिगत समीकरण में सेंधमारी हुई है. बांकीपुर सीट कम मतदान के इतिहास को इस बार भी दोहराया.