टीएनपी डेस्क: बिहार का राजनीतिक माहौल बुधवार को गर्म हो गया है. राजनीतिक मजबूरी कहें अथवा पार्टी का अस्तित्व बचाने की लड़ाई, नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को सड़क पर उतरना पड़ा है. इस आंदोलन को जंतर -मंतर के आंदोलन से भी जोड़कर देखा जा सकता है. क्योंकि आज का युवा अब आक्रामक राजनीति की बात सोच रहा है. बिहार की प्रतिष्ठित बांकीपुर उप चुनाव में प्रशांत किशोर की जीत और टूट रहे वोट बैंक ने भी तेजस्वी यादव को लगभग मजबूर कर दिया है कि वह सड़क की राजनीति करें।
जानकार बताते हैं कि लालू प्रसाद यादव की पार्टी लगभग 11 साल बाद बुधवार को राजभवन मार्च करने निकली है. इन 11 साल में वह तीन-चार साल सरकार में भी रही. जानकारी के अनुसार राजद इससे पहले 2015 में राजभवन मार्च किया था. लालू यादव तब सरकार से 2011 की जनगणना में जातीय गणना की रिपोर्ट जारी करने की मांग कर रहे थे. तेजस्वी यादव भी लगभग 5 साल के बाद सड़क पर पैदल मार्च करते हुए संघर्ष करते दिख रहे है. मार्च 2021 में विधानसभा परिसर में राजद समेत विपक्षी विधायकों से पुलिस की बदसलूकी के खिलाफ तेजस्वी यादव ने विधानसभा मार्च का प्रयास किया था. लेकिन वह अरेस्ट हो गए थे. उस समय राजद कार्यकर्ताओं की पिटाई भी हुई थी.
यह अलग बात है कि तेजस्वी यादव सरकार के खिलाफ अलग-अलग तरह से हल्ला बोलते रहे हैं. यह अलग बात है कि तेजस्वी यादव जनादेश अपमान यात्रा, आरक्षण बढ़ाओ यात्रा, बेरोजगारी हटाओ यात्रा, जन विश्वास यात्रा और वोटर अधिकारी यात्रा के जरिए लोगों का विश्वास अर्जित करने की कोशिश करते रहे है. लेकिन राजद कार्यकर्ताओं में संघर्ष करने और लड़ने का जोश भरने वाला आंदोलन लंबे समय बाद दिख रहा है. बांकीपुर उपचुनाव में विदेश दौरे से वह निशाने पर आये. पार्टी में भी विवाद सामने आ गया है.
बांकीपुर में उनके उम्मीदवार की जमानत भी जब्त हो गई है. बदलते राजनीतिक माहौल और नौजवान पीढ़ी का तेवर भी तेजस्वी यादव को सड़क पर उतरने को मजबूर कर रहा है. जेन - जी के बाद जेन - अल्फा के स्कूली बच्चे भी टीचर तक के लिए आंदोलन कर रहे है. राजनीति को सुविधा के रूप में लेने वाले नेताओं के लिए अब खतरे की घंटी बज रही है. शायद इसलिए भी तेजस्वी यादव अपनी छवि को बदलने के लिए सड़क पर उतर गए हैं. बिहार के बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत और राजद उम्मीदवार का जमानत जब्त होना भी इसका बड़ा कारण बताया जा रहा है. बांकीपुर से यह संदेश साफ हो गया है कि यादव ही नहीं, मुसलमान भी के साथ सवर्ण भी प्रशांत किशोर का समर्थक बन गए हैं.

