पटना(PATNA):बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर ने बड़ी जीत दर्ज की है. प्रशांत किशोर ने 18,953 वोटों के अंतर से चुनाव जीत लिया है. करीब तीन दशक बाद भाजपा को उसके गढ़ बांकीपुर में करारी हार का सामना करना पड़ा है. बदलाव की ऐसी हवा चली कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की पारंपरिक सीट भी भाजपा के हाथ से निकल गई. पहली बार चुनाव लड़ रहे प्रशांत किशोर ने भाजपा को उसके ही मजबूत किले में मात दे दी है.भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की सीट बांकीपुर पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है. बिहार में सिर्फ एक सीट बांकीपुर पर हुए उपचुनाव का परिणाम अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है. भाजपा की इस हार की गूंज पटना से लेकर दिल्ली तक सुनाई दे रही है.
भाजपा अपना किला बचाने में सफल नहीं हो सकी
नितिन नवीन, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और कई केंद्रीय मंत्रियों समेत पूरा बिहार कैबिनेट बांकीपुर में चुनाव प्रचार में जुटा रहा, लेकिन इसके बावजूद भाजपा अपना किला बचाने में सफल नहीं हो सकी. राजनीति में पहली बार चुनावी मैदान में उतरे प्रशांत किशोर ने भाजपा के गढ़ में बड़ी सेंध लगा दी.हालांकि यह सिर्फ एक सीट का उपचुनाव था, लेकिन इस जीत को भाजपा के खिलाफ जनता के गुस्से के तौर पर देखा जा रहा है. चुनावी नतीजों के पीछे कई वजहें मानी जा रही हैं. भाजपा के खिलाफ बने माहौल और पार्टी के अति आत्मविश्वास को हार की बड़ी वजह माना जा रहा है.
जानिए क्या रहे जीत के बड़े फैक्टर
नीट छात्र आंदोलन, यूजीसी से जुड़े मुद्दों और भरत तिवारी मामले को लेकर पैदा हुई नाराजगी का असर भी चुनाव में देखने को मिला. वहीं सम्राट चौधरी को लेकर लोगों के बीच बनी नाराजगी ने भी भाजपा के खिलाफ माहौल तैयार किया.प्रशांत किशोर अपनी व्यक्तिगत छवि और उठाए गए मुद्दों के जरिए मतदाताओं तक पहुंचने में सफल रहे. वहीं विपक्ष की कमजोर मौजूदगी का फायदा भी उन्हें मिला. कांग्रेस लगभग चुनावी मैदान से दूर रही, जबकि राजद की सक्रियता भी सीमित रही. आखिरी समय में तेजस्वी यादव ने प्रचार जरूर किया, लेकिन तब तक विपक्ष का बड़ा वोट प्रशांत किशोर के पक्ष में जाता दिखा.
इस उपचुनाव में जातीय समिकरण हो गया फेल
इस चुनाव की सबसे बड़ी बात यह रही कि जातीय समीकरणों का असर कमजोर नजर आया. मतदाताओं ने जाति-पाति से ऊपर उठकर प्रशांत किशोर के मुद्दों और उनके चेहरे पर भरोसा जताया.भाजपा के लिए उम्मीदवार चयन भी एक बड़ी चुनौती रहा. पार्टी शुरुआत से ही उम्मीदवार को लेकर असमंजस में रही. पहले अभिषेक बंटी का नाम सामने आया, बाद में बदलाव करते हुए नीरज कुमार को मैदान में उतारा गया. प्रशांत किशोर इस संदेश को जनता तक पहुंचाने में सफल रहे कि भाजपा सिर्फ अपने पुराने गढ़ और संगठन के भरोसे चुनाव नहीं जीत सकती.
बांकीपुर बीजेपी का गढ़ था
बांकीपुर को भाजपा का अभेद्य किला माना जाता था, लेकिन इस बार पार्टी का अति आत्मविश्वास ही उसकी हार की बड़ी वजह बन गया. प्रशांत किशोर ने भाजपा के इस मजबूत किले में सेंध लगाकर बिहार की राजनीति में नई चर्चा शुरू कर दी है.

