बिहार का बांकीपुर सीट: प्रशांत किशोर अगर जीतते हैं तो क्या होगा, हारेंगे तो क्या पड़ेगा असर 

बिहार का बांकीपुर सीट: प्रशांत किशोर अगर जीतते हैं तो क्या होगा, हारेंगे तो क्या पड़ेगा असर

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): बिहार का बांकीपुर उपचुनाव अब पूरी तरह से 'हॉट केक' बनेगा. चुनाव की तारीख घोषित हो गई है,अब उम्मीदवारों का ऐलान शुरू हो गया है. जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर बांकीपुर से चुनाव लड़ेंगे, प्रशांत किशोर अपने जीवन का पहला चुनाव लड़ने जा रहे हैं. यह सीट भाजपा का गढ़ रही है. चुनावी रणनीतिकार के तौर पर कई दलों को चुनाव लड़ा चुके और सफलता दिला चुके प्रशांत किशोर अब खुद चुनावी मैदान में उतरेंगें. यह अलग बात है कि प्रशांत किशोर विधानसभा चुनाव में एक भी सीट अपनी पार्टी को नहीं दिला सके थे. 

2025 में प्रशांत किशोर की पार्टी को नहीं मिली थी कोई सीट

माहौल बनाया गया था कि वह करगहर सीट या राघोपुर सीट से 2025 में चुनाव लड़ेंगे, लेकिन चुनाव नहीं लड़ पाए. अब बांकीपुर  सीट से चुनाव लड़ेंगें. 2025 के चुनाव में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन बांकीपुर से चुनाव जीते थे. राजद की रेखा कुमारी को उन्होंने पराजित किया था. एक अनुमान के अनुसार इस सीट पर कुल वोटरों में सवर्ण 35% हैं. जिसमें अकेले कायस्थ जाति के 15% मतदाता हैं. बाकी राजपूत 8%, भूमिहार 7% और ब्राह्मण 5% हैं. ओबीसी भी 33% है, जिसमें बनिया 15% ,यादव 10% और कोइरी और कुर्मी 8% है.13% अति पिछड़ा, 8% दलित महादलित और 10 प्रतिशत मुस्लिम वोटर भी हैं. 1995 से यह सीट भाजपा के पास ही है. पहले पटना पश्चिम नाम की सीट से नितिन नवीन के पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा चार बार और उनके निधन के बाद बांकीपुर बनी सीट से नितिन नवीन पांच बार जीते हैं. 

नितिन नवीन 2006 में पहली बार जीते थे

नितिन नवीन पहली बार 2006 में पिता के गुजरने के बाद उपचुनाव जीते थे. यह अलग बात है कि इस उपचुनाव में भाजपा की टिकट की रेस  में ज्यादा कायस्थ जाति के लोगों का ही नाम उछल रहा है. हालांकि टिकट के फैसले में नितिन नवीन की भूमिका सबसे बड़ी होगी. राजद का उम्मीदवार भी चुनाव लड़ सकता है. प्रशांत किशोर चुनाव परिणाम को सम्राट चौधरी सरकार के कामकाज पर जनादेश के तौर पर लोगों के समक्ष रख रहे हैं और कह रहे हैं कि बांकीपुर का संदेश दिल्ली तक जाएगा. यह अलग बात है कि अगर प्रशांत किशोर बांकीपुर सीट जीत भी जाते हैं, तो सरकार की सेहत पर तो कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन इतना तय है कि बिहार को सरकार पर सीधे हमले का जोखिम लेने वाला एक नेता सदन को मिल जाएगा. खैर-बांकीपुर  एक बार फिर सभी की परीक्षा लेगा.