ये है हमारा समाज! 3 दिन तक पति के शव के पास बैठी रही बेबस पत्नी, लेकिन कंधा देने नहीं आए लोग, पढ़िये क्यों

ये है हमारा समाज! 3 दिन तक पति के शव के पास बैठी रही बेबस पत्नी, लेकिन कंधा देने नहीं आए लोग, पढ़िये क्यों

टीएनपी डेस्क(TNP DESK):इंसान एक सामाजिक प्राणी है, जो समाज के बीच रहकर जीता है और उसी में मरता है. इंसान और जानवरों में बस इतना ही फर्क है कि इंसान के अंदर समझदारी होती है और जानवर अंदर नहीं होते है लेकिन कभी-कभी हमारे समाज में रहने वाले कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो समाज में रहकर भी इन्सानों से जानवरों जैसा बरताव करने लगते है.दरअसल, आज हम ऐसी ही एक घटना की बात कर रहे हैं, क्योंकि बिहार के खगड़िया जिले से एक दिल को झकझोर देने वाली खबर सामने आई है, जिसने गरीबी और समाज के असंवेदनशील चेहरे को उजागर कर दिया है.जहां एक महिला आर्थिक तंगी और बेबसी की वजह से ऐसी असहाय स्थिति में पहुंच गई, जहां दूर-दूर तक कोई मदद करने वाला दिखाई नहीं दे रहा था.

 कंधा देने नहीं आए लोग

 दरअसल, महिला के पति को कैंसर था, जिसके इलाज में काफी पैसा खर्च हो गया और गरीबी ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया.वही जब पति की मृत्यु हुई तो महिला के पास अपने पति के अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं बचे थे.एक तरफ आर्थिक तंगी उसे परेशान कर रही थी, तो दूसरी तरफ उसके पति को कंधा देने के लिए भी समाज से कोई व्यक्ति नहीं आया. लोगों को डर था कि व्यक्ति को कैंसर था, इसलिए कहीं उसे छूने या उसके पास जाने से उन्हें भी संक्रमण न हो जाए. गरीबी और सामाजिक भेदभाव का दर्द झेलती महिला तीन दिन तक अपने पति के शव के साथ बेबस बैठी रही.कोई भी ऐसा इंसान, जिसके अंदर मानवता जिंदा हो, वह इस मंजर को देखकर सहम जाएगा. लेकिन गांव के लोगों को उस महिला पर तब भी तरस नहीं आया. महिला लगातार तीन दिनों तक अंतिम संस्कार के लिए रुपये जुटाने की चिंता में पति के शव के साथ बैठी रही, लेकिन कहीं से भी उसे कोई मदद मिलती दिखाई नहीं दी.

 3 दिन तक पति के शव के पास बैठी रही बेबस पत्नी

दरअसल, यह पूरी कहानी अनिता देवी नाम की एक महिला की है, जिसने सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर हमारे समाज के लोग कैसी सोच रखते है. हमारा समाज आखिर किस दिशा में जा रहा है. एक अकेली महिला को उसके पति के शव के साथ छोड़ दिया गया, लेकिन लोगों को उस पर जरा सा भी तरस नहीं आया.दरअसल, अनिता देवी के पति मन्नू साह लंबे समय से कैंसर से पीड़ित थे.इलाज के दौरान ही उनकी मौत हो गई. महिला की कोई संतान भी नहीं है, जिसकी वजह से उसे न कहीं से आर्थिक मदद मिली और न ही शव को कंधा देने के लिए कोई व्यक्ति आया.महिला ने बताया कि आर्थिक तंगी के साथ-साथ उसे सामाजिक उपेक्षा की मार भी झेलनी पड़ी.उसके पति को गंभीर कैंसर था, जिसकी वजह से लोग संक्रमण फैलने के डर से उसके पास नहीं आ रहे थे. न ही कोई आर्थिक मदद कर रहा था. इसी कारण वह अपने मृत पति के शव के साथ तीन दिनों तक इस उम्मीद में बैठी रही कि शायद कोई उसकी मदद करेगा.

घटना ने खोली समाज के असली चेहरे की पोल

 जब यह हृदय विदारक घटना सोशल मीडिया पर वायरल हुई और चारों ओर इसकी चर्चा होने लगी, तब जाकर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की नींद टूटी.खगड़िया नगर परिषद के नगर सभापति प्रतिनिधि ज्योतिष मिश्रा ने पीड़ित महिला से संपर्क किया और सहायता का भरोसा दिलाया. इसके बाद नगर परिषद की ओर से अंतिम संस्कार की व्यवस्था कराने की पहल की गई.यह दुखद और हृदय विदारक घटना हमारी सामाजिक व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े करती है.यह बताती है कि आखिर हम किस तरह के समाज में रह रहे है. जिंदगी भर हम इस डर में जीते हैं कि समाज के लोग क्या कहेंगे, हमारी इज्जत क्या रह जाएगी और चार लोग क्या सोचेंगे. लेकिन जब इंसान सच में मुसीबत में होता है, तब यही समाज के चार लोग उसकी मदद के लिए आगे नहीं आते.