बिहार में MLC चुनाव के बहाने : मुख्यमंत्री बनने को लालू प्रसाद से नीतीश कुमार तक ने क्या किया ? बीपी मंडल अलग दल बनाकर कैसे बने थे सीएम !
बिहार में शुक्रवार को 8 सीटों पर एमएलसी का चुनाव हो गया, लेकिन इस बार का चुनाव हर बार से कुछ अलग रहा.
बिहार में शुक्रवार को 8 सीटों पर एमएलसी का चुनाव हो गया, लेकिन इस बार का चुनाव हर बार से कुछ अलग रहा.
TNP डेस्क : बिहार में शुक्रवार को 8 सीटों पर एमएलसी का चुनाव हो गया, लेकिन इस बार का चुनाव हर बार से कुछ अलग रहा. बिहार के कई पूर्व मुख्यमंत्रियों के लिए एमएलसी सीट महत्वपूर्ण रही. नीतीश कुमार से लेकर लालू प्रसाद यादव तक बिहार के कई ऐसे नेता रहे, जो एमएलसी बनकर मुख्यमंत्री बने. बिहार में मुख्यमंत्री की अगर अब तक की सूची का अवलोकन किया जाए, तो मुख्यमंत्री बनने के लिए विधानसभा का चुनाव लड़ना और जीतना जरूरी नहीं रहा. बिहार में ऐसे नेता भी मुख्यमंत्री बने, जो विधायक नहीं थे, इनमें कुछ सांसद थे, कुछ कुर्सी के लिए विधान परिषद के सदस्य बने. सबसे दिलचस्प कहानी बीपी मंडल की कही जाती है.
जानकारी के अनुसार 1967 में बिहार विधानसभा चुनाव में पहली बार कांग्रेस के अलावा कई दलों ने मिलकर सरकार बनाई थी. महामाया प्रसाद सिंह मुख्यमंत्री बने थे. इस साल संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर बीपी मंडल लोकसभा पहुंचे थे. वह बिहार में स्वास्थ्य मंत्री बनना चाहते थे. पार्टी के बड़े नेता राम मनोहर लोहिया ने समझाया कि सांसद रहते हुए राज्य सरकार में मंत्री बनने से गलत संदेश जाएगा, लेकिन बीपी मंडल अपनी बात पर अड़े रहे और महामाया बाबू की सरकार में स्वास्थ मंत्री बन गए. सांसद के रहते हुए बीपी मंडल के लिए तय समय में बिहार विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य बनना जरूरी था. लेकिन तकनीकी कारणों से बीपी मंडल को मंत्री पद छोड़ना पड़ा था.
मंत्री पद छोड़ने के बाद बीपी मंडल ने कुछ विधायकों को साथ लेकर अलग दल बनाया। उस समय दल बदल रोकने वाला कानून नहीं था. उन्होंने महामाया सरकार को गिराने की कोशिश शुरू की. दूसरी ओर कांग्रेस भी गैर कांग्रेसी सरकार को हटाने का मौका तलाश रही थी. कांग्रेस ने बीपी मंडल की पार्टी से मिलकर 25 जनवरी 1968 को महामाया सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। सरकार सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाई और गिर गई. इसके बाद कांग्रेस ने बीपी मंडल को मुख्यमंत्री बनने पर सहमति दी. लेकिन वह किसी सदन के सदस्य नहीं थे. विधान परिषद में कोई सीट खाली नहीं थी, ऐसे में बीपी मंडल के सामने राज्यपाल के कोटे से मनोनीत होकर विधान परिषद पहुंचने का एकमात्र रास्ता था.
उन्होंने अपने करीबी सतीश प्रसाद सिंह को 28 जनवरी 1968 को मुख्यमंत्री बनाया। सतीश प्रसाद सिंह ने 29 जनवरी को बीपी मंडल को राज्यपाल के कोटे से विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया। इसके बाद 1 फरवरी 19 68 को सतीश प्रसाद सिंह ने मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया और बीपी मंडल बिहार के मुख्यमंत्री बन गए. इसके बाद जुलाई 19 73 में मुख्यमंत्री केदार पांडे को पद छोड़ना पड़ा. पार्टी में किसी एक नेता के नाम पर सहमति नहीं बनी ,तो अब्दुल गफूर को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला हुआ. उसे समय अब्दुल गफूर बिहार विधान परिषद के सभापति थे. उन्होंने 2 जुलाई 19 73 को विधान परिषद का सदस्य रहते हुए मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. 1988 में कांग्रेस में खींचतान के बाद बिंदेश्वरी दुबे को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा, इसके बाद लोकसभा सदस्य भागवत झा आज़ाद बिहार के मुख्यमंत्री बने. उस समय विधानसभा की कोई सीट खाली नहीं थी. इसलिए वह विधान परिषद के सदस्य बने. उन्हें विधान परिषद के सदस्यों ने चुना था.
मार्च 19 89 में सत्येंद्र नारायण सिंह मुख्यमंत्री बने. उस समय वह औरंगाबाद से लोकसभा सांसद थे. मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए उन्हें बिहार विधान परिषद का सदस्य बनना पड़ा. 1990 में लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने तो वह छपरा से लोकसभा सदस्य थे. उनकी सरकार अल्पमत में थी और विधानसभा चुनाव लड़ना उनके लिए जोखिम भरा हो सकता था. ऐसे में उन्होंने विधायकों के जरिए चुने जाने वाला विधान परिषद का रास्ता अपनाया। 25 जुलाई 19 97 को राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनी तो वह किसी भी सदन की सदस्य नहीं थी. मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए भी वह विधान परिषद की सदस्य बानी। नवंबर 2005 में नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने तो वह नालंदा से लोकसभा सांसद थे. मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए उन्हें भी विधान परिषद का सदस्य बनना पड़ा था. नीतीश कुमार के विधान परिषद के सदस्य रहते हुए लंबे समय तक बिहार में सरकार चलाई और लगभग बीस सालों तक बिहार के सीएम रहे.