क्या अब पलामू के नीलांबर-पीतांबर के नाम पर रखा जाएगा रातू रोड एलिवेटेड फ्लाईओवर का नाम? जानिए

    क्या अब पलामू के नीलांबर-पीतांबर के नाम पर रखा जाएगा रातू रोड एलिवेटेड फ्लाईओवर का नाम? जानिए

    रांची(RANCHI):
    राजधानी रांची का रातू रोड एलिवेटेड फ्लाईओवर लगातार चर्चा का पात्र बना हुआ है. पर खास बात यहाँ ये है कि राजधानी रांची में बनाए गए इस फ्लाईओवर को लेकर पलामू तक चर्चा हो रही है. दरअसल पलामू से भाजपा के सक्रिय नेता अरविंद तिवारी ने भी फ्लाईओवर के नामकरण को लेकर केन्द्र झारखंड सरकार और बीजेपी झारखण्ड प्रदेश संगठन को पत्राचार के जरिए फ्लाइओवर का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी नीलांबर और पितांबर के नाम पर रखने की मांग की है. ऐसे में माननीय मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सह पूर्व मुख्यमंत्री बाबुलाल मरांडी, केन्द्रीय रक्षा राज्यमंत्री सह रांची सांसद संजय सेठ और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सह राँची के विधायक सी.पी. सिंह से मुलाक़ात कर फ्लाइओवर का नामकरण नीलांबर और पितांबर के नाम पर करने की मांग की है.

    ऐसे में इस फ्लाइओवर को लेकर भी राजनीति हो रही है. एक ओर जहां झारखंड मुक्ति मोर्चा और कॉंग्रेस के नेताओं ने फ्लाईओवर का नाम दिशोम गुरु शिबू सोरेन के नाम पर करने की मांग की थी. वहीं दूसरी ओर आजसू से लंबे समय से जुड़े और झारखंड आंदोलनकारी हिमांशु कुमार ने फ्लाईओवर का नाम बिनोद बिहारी के नाम पर रखने की मांग की है.

    आपको बताते चले कि फ्लाईओवर के उद्घाटन को लेकर भी पहले 19 जुलाई का दिन निर्धारित किया गया था, पर सड़क एवं परिवहन मंत्री की व्यस्तता को देखते हुए अब उद्घाटन का दिन 3 जुलाई को निर्धारित किया गया है.

    कौन थे नीलांबर - पीतांबर ?

    नीलांबर और पीतांबर, झारखंड के दो काफी प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे. इन दोनों भाईयों ने 1857 के भारतीय विद्रोह में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी. नीलांबर और पीतांबर, दोनों ही खरवार जनजाति के भोगता वंश से ताल्लुक रखते थे और  झारखंड के पलामू क्षेत्र के रहने वाले थे. 1857 में जब पूरे भारत में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह हो रहा था, तब नीलांबर और पीतांबर ने अपने क्षेत्र में विद्रोह का नेतृत्व किया था. दोनों भाइयों ने चेरो और खरवार जनजातियों को संगठित किया था और अंग्रेजों के खिलाफ छापामार युद्ध भी लड़ा था. वहीं 1859 में अंग्रेजों ने दोनों भाईयों को पकड़कर उन्हें फांसी दे दी गई थी.


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