क्यों धराशाई हो जाती है हेमंत की नीति, जानिए क्या कानून को ताक पर रखना पड़ रहा है भारी

    क्यों धराशाई हो जाती है हेमंत की नीति, जानिए क्या कानून को ताक पर रखना पड़ रहा है भारी

    रांची (RANCHI): आखिर क्यों कोर्ट में  जाकर धरशाई हो जाती है सरकार की हर नीति. क्यों नीति पेश करने से पहले सरकार इसकी कानूनी समीक्षा नहीं करती.  क्या हेमंत सरकार जल्दबाजी में है या इसके पीछे है राजनीति. आज झारखंड ऐसे कई सवालों से जूझ  रहा जहां सीएम के फैसले को कोर्ट ने रद्द कर दिया है. बहरहाल आज राज्यपाल से मिलेंगे सीएम के प्रतिनिधि. सीएम हेमंत सोरेन के 20 विधायक को  आज दोपहर के तीन बजे  राज्यपाल रमेश बैस से मिलने का समय मिला है. बता दें हाल ही में  विधानसभा से पास हुए 1932 आधारित खातियान बिल को लेकर ये मुलाकात की जाएगी. हेमंत के विधायक राज्यपाल से आग्रह करेंगे की इस बिल को आगे बढ़ाया जाए. बता दें 11 नवंबर, 2022 को झारखंड विधानसभा से इस बिल को सर्वसम्मति से पारित कराया गया है. इसके बाद से ही इस बिल की आलोचनाएं हो रही है. सूत्रों की माने तो इस बिल के पास होने में 1932 को आधार बनाना ही सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आ सकती है. 1932 के खतियान के आधार पर झारखंडियों की पहचान और राज्य में ओबीसी सहित अन्य वर्गों की आरक्षण सीमा को बढ़ाने संबंधित मुद्दे पर विधायक राज्यपाल रमेश बैस से मुलाकात करेंगे़ मंगलवार को करीब 20 विधायक दिन के तीन बजे राज्यपाल से मिलेंगे.

    सभी दलों को सीएम ने लिखा पत्र जानिए क्यों

    इधर,  मुख्यमंत्री  हेमंत सोरेन ने सभी दलों को पत्र लिख कर अपना प्रतिनिधि भेजने का आग्रह किया है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने दलों के नेताओं को पत्र लिख कर कहा है कि आरक्षण संशोधन विधेयक और झारखंड स्थानीय व्यक्तियों की परिभाषा व इसके लाभों से जुड़े विधेयक को संवैधानिक कवच प्रदान कराना सरकार की प्राथमिकता है. 11 नवंबर, 2022 को झारखंड विधानसभा से इसे सर्वसम्मति से पारित कराया गया है. पूर्व में भी झारखंड में जब भी स्थानीय नीति बनाने का प्रयास कार्यपालिका से हुआ है. उसमें सफलता नहीं मिली है. उच्च न्यायालय द्वारा उन नीतियों को खारिज किया जाता रहा है. ऐसे में 20 दिसंबर को सत्ता पक्ष के विधायक राज्यपाल से मिल कर खतियान और आरक्षण का बिल केंद्र सरकार को जल्द से जल्द भेजने का आग्रह करेंगे.

    कोर्ट ने नियोजन नीति को किया था रद्द

    बीते दिनों हाईकोर्ट द्वारा नियोजन नीति को रद्द कर दिया गया था. इस नीति में अनेक खामियां पाई गई थी जो संविधान का उल्लंघन करते हैं. ऐसे में हाईकोर्ट ने इस नियोजन नीति को खारिज कर दिया था. इसके बाद हेमंत सरकार की विपक्ष ने भी बड़ी किरकिरी की थी. अब 1932 खतियान को लेकर भी कुछ ऐसा ही माहौल बन रहा कि इसके लागू होने में भी कई पेंच है ऐसे में विशेषज्ञों के कयास लगाए जा रहे हैं की कहीं नियोजन नीति की तरह ही 1932 आधारित खातियान आरक्षण का हाल न हो जाए.

    जानिए अबतक क्या हुआ

    बता दें बीते 11 नवंबर को झारखंड विधानसभा में 1932 खतियान को पास कराया गया था और नियमानुसार इसे राज्यपाल के पास आगे बढ़ाने के लिए भेज दिया गया था. परंतु इसके पास होते ही विवादों ने माहौल को गरम कर दिया, भाजपा का कहना था की इस बिल में कुछ कमियां हैं. तथा ये बिल संविधान के आदेशों का पूरी तरह पालन नहीं करते. सबसे पहला मुद्दा ये है कि इस विधेयक में  1932 को आधार मानने से झारखंड के बहुत बड़ी आबादी झारखंडी नहीं रह जाएगी इसलिए इस विधेयक में संशोधन आवश्यक है. ये जल्दबाजी में लिया गया निर्णय है. वहीं हेमंत ने इस विधेयक को संविधान की नौवीं सूची में शामिल करने का आग्रह किया है जिससे इस कानून को कोई दुबारा चैलेंज न कर सके. बीजेपी लगातार सरकार पर अपना दबाव बनाई हुई है. मालूम हो की इस समय सरकार पर खनन घोटाले का आरोप भी लग चुका है इस संदर्भ मे नामी गिनामी रसूकदार लोग ईडी  के हत्थे चढ़ कर जेल की हवा खा रहे. एडी ने हेमंत सोरेन को भी पूछताछ के लिए दफ्तर बुलाया था.

    जानिए क्या है 1932 के खतियान

    1932 के खतियान को  आधार बनाने का मतलब यह है कि उस समय जिन लोगों का नाम खतियान में था, वे और उनके वंशज ही स्थानीय कहलाएंगे. उस समय जिनके पास जमीन थी, उसकी हजारों  बार खरीद-बिक्री हो चुकी है. उदाहरण के तौर  पर 1932 में अगर रांची जिले में 10 हजार रैयतों थे तो  आज उनकी संख्या एक लाख पार कर गई. अब तो  सरकार के पास भी यह आंकड़ा नहीं है कि 1932 में जो  जमीन थी, उसके कितने टुकड़े हो चुके हैं.

    क्या केवल लोक लुभावन वादे करती है सरकार!

    आखिर क्या कारण है की हेमंत सरकार जो भी फैसले लेती है वो कानूनी दांव पेंच में जाकर फंस जाता है. बता दें हेमंत सोरेन की सरकार ने अब तक के अपने कार्यकाल में तीन अहम फैसले लिये हैं, जिसकी तारीफ झारखंडी आदिवासी-मूलवासी समाज तो कर रहा है. उन्हे ये भरोसा तो हो रहा है की सरकार उनकी तरफदार कर रही लेकिन इसके पीछे के विधि कानून की समझ न रखने के कारण पूरी तरह नहीं समझ पा रहे. इससे सवाल उठता है कि क्या सरकार जानबूझ कर जनता की कम कानूनी समझ का फंड उठा रही या सरकार को खुद ही समझ काम है. देखा जाए तो कानूनी दांव-पेंच और सियासी चाल समझने में आम आदमी तो अक्षम ही होता है, पर सत्ताधारी दलों के नेता इसे उनके हित में बता कर उनकी सहानुभूति बटोरने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते. अभी कुछ दिनों पहले ही हेमंत की सरकार ने नयी नियोजन नीति बनायी थी, जिसे हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है. हेमंत सोरेन की दूसरी बड़ी उपलब्धि 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीयता नीति बनाने का प्रस्ताव विधानसभा से पास कराना. हेमंत ने नेतरहाट फायरिंग रेंज को बंद करने का लोकलुभावन वादा भी किया है. यह जानते हुए भी कि यह रक्षा मंत्रालय के दायरे में है, उन्होंने लोगों को खुश करने के लिए यह घोषणा की है. सबसे दिलचस्प तो यह कि 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीयता नीति तो बन जाएगी,  लेकिन केंद्र की नौंवीं अनुसूची में इसे शामिल करना होगा. दूसरा कि इसी साल विधानसभा में खुद हेमंत सोरेन ने स्वीकार किया था कि 1932 के आधार पर स्थानीयता नीति बनती भी है तो उसके कोर्ट में खारिज हो जाने का खतरा है. इसीलिए उन्होंने केंद्र की नौवीं अनुसूची का पेंच फंसा दिया. क्या सरकार सांप भी मर जाय और लाठी भी न टूटे वाले अंदाज में काम कर रही है . इसी साल 14 सितंबर को स्थानीयता नीति के प्रस्ताव को मंजूरी दी है. प्रस्ताव के मुताबिक झारखंड की भौगोलिक सीमा में जो रहता हो और स्वयं अथवा उसके पूर्वज के नाम 1932 अथवा उसके पूर्व के सर्वे के खतियान में दर्ज हों, वह झारखंडी माना जाएगा. भूमिहीन के मामले में उसकी पहचान ग्राम सभा करेगी, जिसका आधार झारखंड में प्रचलित भाषा, रहन-सहन, वेश-भूषा, संस्कृति और परंपरा होगी. पेंच इसमें यह फंसा है कि इस प्रावधान को भारत के संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए भारत सरकार से अनुरोध किया जाएगा. अधिनियम संविधान की नौवीं अनुसूची में सम्मिलित होने के उपरांत ही प्रभावी माना जाएगा. सभी जानते हैं कि स्थानीयता नीति राज्य सरकार के दायरे की बात है तो इसमें केंद्र की भूमिका क्यों तय कर दी गयी. जो लोग थोड़ा बहुत राजनीतिक समझ रखते हैं, उन्हें मालूम है कि यह हेमंत सरकार का राजनीतिक स्टंट है. झारखंड प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष सांसद दीपक प्रकाश का कहना है कि हेमंत सरकार मुद्दों को लटकाने, भटकाने और अंटकाने का काम करती है. यह सरकार केवल योजनाओं को लटकाने, भटकाने और अंटकाने का काम करती है़. झारखंड के मूलवासी हेमंत सरकार की नियोजन नीति से परेशान थे. भाषा के आधार पर भी राज्य सरकार ने अनुचित निर्णय लिया है. घर-घर बोली जाने वाली हिंदी और अंग्रेजी को हटाकर इस सरकार ने चंद लोगों द्वारा व्यवहार में लायी जाने वाली उर्दू भाषा को तुष्टीकरण के तहत प्राथमिकता दी थी. तो क्या साफ शब्दों मे इससे  ये समझ जा सकता है की ये लोकलुभावन वादे सिर्फ जनता को  भरमाने के लिए किए जा रहे हैं , क्या हेमंत के सचिव कानून  संविधान की समझ नही रखते जो ऐसी गलतियां करते हैं.  

    गवर्नर के पास भेजा गया है  1932 खतियान बिल

    1932 खतियान विधेयक राज्यपाल रमेश बैस की स्वीकृति के लिए उनके पास भेज दिया गया है. विधानसभा के विशेष सत्र में पेश किये गये अधिनियम में स्थानीय को ही राज्य सरकार के तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की नौकरियां देने से संबंधित प्रावधान को जोड़ कर अधिनियम राज्यपाल को भेजा गया है. इसी विधेयक को आगे बढ़ाने के लिए आग्रह करने हेमंत के बीस विधायक आज राज्यपाल से मिलेंगे.  सोमवार को विधानसभा में कार्यमंत्रणा की बैठक में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पक्ष-विपक्ष के विधायकों से आग्रह करते हुए कहा कि इस मामले को लेकर राज्यपाल से मुलाकात कर आग्रह किया जाये. कोर्ट ने नियोजन नीति रद्द कर दी है. इससे राज्य के युवाओं में निराशा है़ खतियान आधारित नियोजन नीति से सारी समस्याएं दूर होंगी़ राज्यपाल से आग्रह किया जायेगा कि वह राज्यहित में बिल जल्द केंद्र को विचार के लिए भेज दें. राज्यपाल की सहमति के बाद ही विधेयक राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जायेगा.


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