धनबाद रेल मंडल को सावन में ही क्यों मिला "त्रिशूल", पढ़िए इस रिपोर्ट में इसकी खासियत और बनावट 

    धनबाद रेल मंडल को सावन में ही क्यों मिला  "त्रिशूल", पढ़िए इस रिपोर्ट में इसकी खासियत और बनावट

    धनबाद(DHANBAD) : भारतीय रेल में  "त्रिशूल" अब अपना कमाल दिखायेगा, धनबाद रेल मंडल को इसका सीधा फ़ायदा होगा. अब एक मालगाड़ी के साथ तीन मालगाड़ियां चलेगी. धनबाद रेल मंडल को इसलिए काफी फायदा हो सकता है क्योंकि माल ढुलाई में धनबाद रेल मंडल देश में नंबर वन है. यहां से कोयले की ढुलाई  से काफी राजस्व की प्राप्ति होती है. "त्रिशूल" की विशेषता है कि एक साथ तीन ट्रेनों की बोगियां चलेगी. सोमवार को पंडित दीनदयाल उपाध्याय मंडल ने भारतीय रेल के इतिहास में पहली बार एक साथ तीन माल गाड़ियों को जोड़कर परिचालन किया गया. हाल के दिनों में रेलवे में यात्री ट्रेनों की संख्या बढ़ाने की ओर ध्यान दिया है. साथ ही मालगाड़ियों को भी कम खर्चे पर चलाने  की व्यवस्था की गई है. 

    जुगाड़ तंत्र  तकनीक पर पड़ा भारी 
     
    इसे जुगाड़ तंत्र कहा जा रहा है. इस जुगाड़ तंत्र से कम लागत से अधिक माल की ढुलाई हो सकती है. भारतीय रेल ने परिचालन दक्षता में वृद्धि, समय की बचत और परिवहन लागत में कमी को लेकर जुगाड़ तंत्र का सहारा लिया है. इसके तहत पूर्व मध्य रेल के पंडित दीन दयाल उपाध्याय मंडल(डीडीयू मंडल) ने भारतीय रेल के इतिहास में संभवतः पहली बार एक साथ तीन मालगाड़ियों को जोड़कर चलाया है. बताया जाता है कि  तीनों मालगाड़ियों को डीडीयू यार्ड में परीक्षण के बाद गंजख्वाजा में जोड़कर 'त्रिशूल' बनाया गया, जिसकी लंबाई 2 किलोमीटर से अधिक है. जोड़ने  के बाद वीएजी-12 से परिचालित 'त्रिशूल' को गंजख्वाजा से सोमवार की रात करीब 20 बजे धनबाद मंडल के लिए रवाना किया गया. 

    50 किलोमीटर प्रति घंटे की औसत गति से चलेगा 

    "त्रिशूल" करीब चार घंटे में 50 किलोमीटर प्रति घंटे की औसत गति के साथ बीडी सेक्शन होते हुए लगभग 200 किलोमीटर की यात्रा के बाद गढ़वा रोड में पंहुचा, इसके बाद 'त्रिशूल' को  धनबाद मंडल को सौंप दिया गया. बता दें कि धनबाद रेल डिवीजन पहले पांच अन्य डिवीजन के साथ ईस्टर्न रेलवे में था. लेकिन 2002 में ईस्टर्न सेंट्रल रेलवे बनने के बाद धनबाद ईस्ट सेंट्रल रेलवे के हिस्से में आ गया. इसके साथ चार अन्य डिवीजन भी सेंट्रल रेलवे के हिस्से में आए और इसका मुख्यालय हाजीपुर बना. चार अन्य डिवीजन में मुगलसराय, दानापुर, सोनपुर और समस्तीपुर शामिल है. धनबाद रेल डिवीजन को भारतीय रेलवे का "कमाऊ पूत " कहा जाता है, क्योंकि रेलवे को एक बड़ा राजस्व धनबाद से मिलता है. यहां से कोयले की ढुलाई में भारतीय रेल को काफी आमदनी होती है.  कोयला उत्पादक कंपनी कोल इंडिया की  अनुषंगी  कंपनी बीसीसीएल की आर्थिक सेहत  धनबाद रेल मंडल पर ही निर्भर करता है.  

    धनबाद रेल मंडल पर निर्भर करती है बीसीसीएल की आमदनी 

    धनबाद रेल मंडल जितनी तीव्र गति से रेल बैगन उपलब्ध कराता है, बीसीसीएल की आमदनी उसी अनुपात में बढ़ती है. यह अलग बात है कि इससे रेलवे को भी बड़ा फायदा होता है और धनबाद रेल डिवीजन पूरे देश में अपनी बादशाहत बनाए रखने में कामयाब रहता है. अब धनबाद रेल मंडल को "त्रिशूल" दे दिया गया है. इस "त्रिशूल" से धनबाद रेल मंडल से कोयले की ढुलाई की रफ्तार बढ़ेगी. इसका फायदा सिर्फ धनबाद रेल मंडल को ही नहीं होगा, बल्कि भारत को किंग कोल  लिमिटेड को भी इसका फायदा हो सकता है. यह  अलग बात है कि धनबाद रेल मंडल को यात्री ट्रेन देने में रेलवे आनाकानी करता रहा है. धनबाद के लोग 20 साल से भी अधिक समय से दिल्ली के लिए सीधी ट्रेन की मांग कर रहे हैं, लेकिन उन्हें नहीं दिया जाता. कभी कहा जाता है कि धनबाद रेल मंडल माल ढुलाई डिवीजन है, इसलिए यात्री ट्रेन अगल-बगल के स्टेशनों से दी जाती है. जो भी हो, लेकिन धनबाद रेल मंडल भारतीय रेल का "बैकबोन" है, इससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता है. 

    रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो 



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