कलम में बड़ी ताकत होती है, कहावत को चरितार्थ किया दुमका की दिव्या पहाड़िया ने, जानिए क्या है पूर मामला

    कलम में बड़ी ताकत होती है, कहावत को चरितार्थ किया दुमका की दिव्या पहाड़िया ने, जानिए क्या है पूर मामला

    दुमका (DUMKA) : कहते है कलम में बड़ी ताकत होती है. इस कहावत को चरितार्थ किया है दुमका की दिव्या पहाड़िया ने.  दिव्या आज झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले बच्चों के बीच कलम की ताकत और अहमियत का अहसास करा दिया. लगातार जोश और जज्बे से भरी दिव्या अपनी पढ़ाई भी जारी रखी हुई है और इस काम मे उसे जिला प्रशासन का भरपूर सहयोग भी मिल रहा है. आखिर आप भी सोच रहे होंगे कि आखिर कौन है दिव्या. आज क्यों उसकी जिक्र जिले में हर तरफ हो रही है. दिव्या सैकड़ों लड़कियों और बच्चों को पढ़ा कर अपना परवरिश कर रही है.

    नक्सल प्रभावित क्षेत्र से आती है दिव्या

    दरअसल दिव्या विलुप्तप्राय आदिम जनजाति समूह पहाड़िया जनजाति से आती है. दिव्या मूल रूप से जिले के नक्सल प्रभावित काठीकुंड प्रखंड के महुआगड़ी की रहने वाली है. लेकिन उसका परवरिश गोपीकांदर प्रखंड के कुंडा पहाड़ी स्थित ननिहाल में हुई. घर हो या ननिहाल दोनों घोर उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र है.

    नक्सली संगठन में शामिल हो गई थी दिव्या की मां

    दिव्या के ननिहाल पहुंचने की कहानी भी कम रोचक नहीं है. दिव्या की माँ का नाम प्रेशीला देवी है .जिसकी शादी महुवागड़ी निवासी रविन्द्र देहरी से हुई. समय के साथ प्रेशिला एक बेटी और एक बेटा को जन्म दिया. लेकिन उसके बाद प्रेशिला नक्सल विचारधारा से प्रभावित होकर दोनों बच्चों को छोड़ भाकपा माओवादी संगठन में शामिल हो गयी. संगठन में शामिल होने के बाद प्रेशिला पीसी दी के नाम से कुख्यात हुई. संगठन में रहते उसने सुखलाल देहरी से शादी कर ली.

    उधर दिव्या के पिता रविन्द्र देहरी ने प्रेशिला के संगठन में शामिल होने के बाद घर छोड़ कर दूसरी शादी रचा ली. घर पर दिव्या और उसका भाई सुमन देहरी रह गये थे.  खराब हालात के चलते  दिव्या और सुमन को अपना घर छोड़कर अपने ननिहाल कुंडा पहाड़ी जाना पड़ा. लेकिन कहा जाता है कई समस्याओं की जननी गरीबी होती है. मुफलिसी और फकाकाशी से जूझते हुए दिव्या का भाई सुमन मुख्य धारा से भटक गया और आज दुमका केंद्रीय कारा में बंद है.

    बंदूक की बजाय कलम को बनाया अपना हथियार

    कहते है ना कि सही लिया गया एक फैसला जीवन की दशा और दिशा दोनों बदल देती है. ऐसा ही कुछ कदम दिव्या ने उठाया . पहाड़ सरीखे मुसीबतों के बाबजूद उसने अपनी माँ और भाई से अलग बंदूक की बजाय कलम को अपना हथियार बनाने का फैसला लिया. वर्ष 2018 में काठीकुंड के नकटी स्थित जनजाति विद्यालय से मैट्रिक पास की और आज वह आदित्य नारायण कॉलेज में स्नातक की पढ़ाई कर रही है. मैट्रिक के बाद दिव्या ने पढ़ाई के साथ-साथ अपनी माँ प्रेशिला, जिस पर सरकार ने 5 लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा था, को मुख्य धारा में लाने की ठानी. इसमें उसे समय तो जरूर लगा लेकिन आखिरकार सफलता मिली. 17 जून 2019 को संगठन में पीसी दी के नाम से मशहूर प्रेशिला अपने दूसरे पति सहित संगठन के 4 अन्य दुर्दांत नक्सली के साथ आत्मसमर्पण कर दिया. फिलहाल वो हजारीबाग ओपन जेल में है.

    जिले के तत्कालीन डीसी रविशंकर शुक्ला से लगाई मदद की गुहार

    इधर दिव्या कॉलेज में पढ़ाई कर रही है. लेकिन उसकी पढ़ाई में जब आर्थिक बाधा आने लगी तो उसने कुछ महीने पूर्व जिले के तत्कालीन डीसी रविशंकर शुक्ला से मिलकर मदद की गुहार लगाई. डीसी ने दिव्या की मदद के लिए उसे जिले में लाइब्रेरी मैन के रूप में मशहूर बाजार समिति के पणन सचिव संजय कच्छप के पास भेजा. लाइब्रेरी मैन संजय कच्छप अपने आवासीय परिसर में झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले बच्चों से लेकर प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने वालों को पढ़ाने का कार्य करते हैं. संजय कच्छप ने दिव्या को झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले बच्चों को पढ़ाई की जिम्मेदारी सौपी. शिक्षा के महत्व को बखूबी समझने वाली दिव्या अपने दायित्व का निर्वहन बेहतर तरीके से कर रही है. जिससे उसे कुछ आर्थिक मदद मिल जाती है. होस्टल से हटिया परिसर स्थित संजय कच्छप के लाइब्रेरी तक आने -जाने में उसे दिक्कत हो रही थी तो उसे साइिकल उपलब्ध कराया गया. दिव्या का कहना है कि वह पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती है और यह कलम के बदौलत ही संभव है.

    रोजाना दो दर्जन बच्चों को पढ़ाती है दिव्या

    इस बाबत लाइब्रेरी मैन संजय कच्छप का कहना है कि दिव्या में पढ़ने और पढ़ाने की ललक है. वह रोज दो दर्जनोंं बच्चों को पढ़ाती है. उसकी पढ़ाई से बच्चे भी खुश हैं. पहले पांच बच्चे आते थे, लेकिन अब संख्या बढ़कर दो दर्जन तक पहुंच गई. उसे हर तरह से मदद कर आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास है. वैसे तो कहा जाता है कि बच्चों की परवरिश पर घर, परिवार और समाज के माहौल का प्रभाव पड़ता है. लेकिन दिव्या ने इस कहावत को झूठा साबित कर दिया है. जन्म के 5 साल बाद ही माता पिता के स्नेह से वंचित हो गयी. घर से लेकर ननिहाल तक बंदूक लेकर विचरण करने वाले नक्सलियों को देखने के बाबजूद कलम की ताकत को पहचानी और आज कलम के बदौलत बंदूक को नतमस्तक किया. उम्मीद की जानी चाहिए कि दिव्या पढ़ लिख कर एक अलग इतिहास लिखेगी, क्योंकि उसे कलम की ताकत का एहसास है. अपने ऊपर भरोसा भी है. जरूरत है जिला प्रसासन की द्वारा जिस तरह उसे मदद की जा रही है,  वो आगे भी जारी रहे ताकि दिव्या की राहें आसान हो सके.

    रिपोर्ट. पंचम झा


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