धनबाद का जमाड़ा- दर्द ऐसा कि न सहा जाये और न कहा जाये 

    धनबाद का जमाड़ा- दर्द ऐसा कि न सहा जाये और न कहा जाये 

    धनबाद(DHANBAD): कार्यालय धनबाद में और नाम झरिया माइन्स बोर्ड. यह व्यवस्था 1915 में  अंग्रेजों ने की थी. कोलियरी क्षेत्रों की सफाई की व्यवस्था के साथ-साथ फूड लाइसेंस अथॉरिटी भी झरिया माइन्स बोर्ड ही थी. तोपचाची में इसका अपना गेस्ट हाउस था. वह भी पहाड़ो के बीच में. अग्रेज अधिकारी वह छुट्टियां बिताने जाते थे. तोपचांची से लेकर मैथन तक, धनबाद से लेकर सिंदरी तक, धनबाद से लेकर चास  तक झरिया माइन्स बोर्ड के अंचल कार्यालय हुआ करते थे और इलाके की  सफाई  व्यवस्था की पूरी जिम्मेवारी इसी  के पास होती थी. माइंस बोर्ड भैंसा खरीदता था  और भैंसा गाड़ी भी हर अंचल कार्यालयों में रखी जाती थी.  और सफाई की जाती थी लेकिन वह जमाना अंग्रेजों का था. 

    1950 में बना था झरिया वाटर बोर्ड 
     
    1950 के आसपास कोलियरी इलाकों में जलापूर्ति के लिए दामोदर नदी से पानी आपूर्ति की जरूरत महसूस हुई तो झरिया वाटर बोर्ड का गठन हुआ.  हालांकि यह झरिया वाटर बोर्ड और माइंस बोर्ड कई नामों से गुजरते हुए आज झारखंड खनिज विकास प्राधिकार (जमाड़ा )के नाम से संचालित है.  इसके पहले माडा  हुआ करता था.  झरिया माइन्स बोर्ड और  वाटर बोर्ड को मिलाकर जब माइनिंग एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी बना तो  पहले एमडी बिहार के वरीय आईएएस बने.  पूर्व विधायक फूलचंद मंडल और पूर्व मंत्री आबो  देवी इसके अध्यक्ष भी रह चुके हैं, लेकिन आज जमाडा  खुद आर्थिक संकट से जूझ रहा है.  सरकार का भी इस पर कोई विशेष ध्यान नहीं है. हालत यह है कि जो कर्मचारी पहले कार्यरत थे ,और अभी जो नौकरी में है, दोनों परेशानी झेल रहे है. परेशानी भी ऐसी- वैसी नहीं, रिटायर्ड कर्मचारियों का  पावना नहीं मिलने से बहुत तो ईश्वर के प्यारे हो गए और बहुतों के पैसा के अभाव में बच्चियों की शादी टूट गई तो किसी के बच्चों की पढ़ाई बाधित हुई.

    380 नौकरी में और 805 सेवानिवृत 

     एक आंकड़े के मुताबिक नौकरी कर रहे 380  और सेवानिवृत्त 805 कर्मचारी अभाव में गुजारा कर रहे है.  बकाया मांग रहे हैं, तनख्वाह मांग रहे हैं लेकिन मिल नहीं रहा है.  विभाग की हालत को लेकर कई बार विधानसभा में प्रश्न भी उठाए गए, विधायक राज सिन्हा ने कर्मचारियों को साथ लेकर रांची में अधिकारियों से भी मिले, आश्वासन मिला लेकिन हुआ कुछ नहीं. नतीजा है कि अपने समय का प्रभावकारी यह विभाग आज अभाव का दंश झेल रहा है.  रिटायर्ड कर्मचारी बताते हैं कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद यह व्यवस्था बनी थी कि रिटायर्ड कर्मियों को हर एक महीने ₹50000 का भुगतान होगा लेकिन 30 जून के बाद यह भुगतान भी नहीं किया जा रहा है. कार्यरत कर्मियों का वेतन भी लंबित है.  फिलहाल नगर आयुक्त सत्येंद्र कुमार ही इसके एमडी  के अतिरिक्त प्रभार में है.


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