साहिबगंज के पागार पहाड़ में बूंद बूंद पानी के लिए जद्दोजहद, नाली समान गंदा पानी पीने को मजबूर ग्रामीण   

    साहिबगंज के पागार पहाड़ में बूंद बूंद पानी के लिए जद्दोजहद, नाली समान गंदा पानी पीने को मजबूर ग्रामीण   

    साहिबगंज(SAHIBGANJ):समय बदल गया, हालात बदल गए, और सोना जैसे झारखंड में कई सरकारें बदल गई, लेकिन गरीबों की जिंदगी में रुमानियत नहीं आई. हाल यह है कि जिसकी वोट से सरकार बनती है वहीं वोटर जद्दोजहद  गुलामी वाली भारत की जिंदगी जी रहे हैं.एक तरफ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया और बुलेट ट्रेन की सपना देखा रही है,और इस युग में यदि आपको नाले के पानी के माफिक पीने के लिए पानी दिया जाये तो आप क्या उसे पी पायेंगे.सवाल थोड़ा कड़वा जरूर है लेकिन यही हकीकत है साहिबगंज के तालझारी की.यहां के लोग आज भी नाले के गंदी पानी पीने को मजबूर है. 

    लोगों को एक छटाक शुद्ध पानी तक नसीब नहीं हो पा रहा है. 

    पहाड़ियों के खूबसूरत वादियों से गिरा झारखंड में रहनेवाले झारखंड सरकार के संरक्षित जन जातीय समुदाय यानी आदिम जनजाति के लोगों का गांव भी पहाड़ है और रास्ता भी पहाड़ है और जिंदगी भी पहाड़ ही है.पहाड़ो पर निवास करनेवाले आदिम जनजातियों के लोगों का जीवन की शुरुआत पहाड़ से ही होता है और शायद जद्दोजहद कर पहाड़ो पर ही खत्म हो जाता है.यह नजारा है कि बोरियो विधानसभा क्षेत्र के तालझारी प्रखंड पर स्तिथ पागर पहाड़,बालको पहाड़ की,जिसके आसपास में पत्थर खदान हैं इस संचालित पत्थर खदान से सालाना शायद सरकार को करोड़ों का राजस्व जाता है, लेकिन जिसकी जमीन पर यह खदान बसाये गये हैं उन पहाड़िया लोगों को एक छटाक शुद्ध पानी तक नसीब नहीं हो पा रहा है.हाल यह है कि इन पहाड़िया लोगों ने जानबर त क पालना बंद कर दिया है.क्योंकि इन्हें अपने की प्यास बुझाने के लिए एक छटाक पानी के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है,तो पशुओं को क्या खाक पानी पिलायेंगे.एक बात हजम नहीं हो रही है कि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन व उनके सांसद विजय हांसदा और उनके ही विधायक लोबीन हेम्ब्रम कई बार इस इलाके का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं,बावजूद इसके उनके क्षेत्र में ऐसी व्यवस्था क्यों,संविधान में भी लिखा गया है सबको कायदे से जीने का अधिकार है. 

    एक कुआं पर निर्भर है पूरा गांव 

    यहां रहनेवाले लोगों की जिंदगी में यदि कोई समस्या है, तो उसकी व्यवस्था करने के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाल की गयी है. जब लोग ऐसी व्यवस्था में जिंदगी काटेंगे तो लोकतांत्रिक व्यवस्था सवाल उठना लाजमी है. सिर्फ हेमंत सोरेन ही नहीं इनके पहले भी जिन नेताओं ने इन इलाकों का प्रतिनिधित्व किया,उन्होंने भी इनके बारे में तनिक भी नहीं सोचा. फिलहाल छटाक भर पानी की व्यवस्था पानी की व्यवस्था के बारे में गांव के लोगों की सुनें तो इस गांव में एक मात्र कुआं है. वह भी सूखा हुआ है.इस कुआं में हर आधे घंटे में आधा बाल्टी पानी जमता है.इस कुएं में जाने के लिए गांव के युवाओं ने अपनी पारी बांध ली है.हर एक घंटे के लिए एक युवक इस कुएं में उतरता है और जो भी एक दो बाल्टी पानी इसमें जमता है उसे लौटा से उठाता है और बाल्टी में भर कर ऊपर भेजता है.बस जो भी पानी इससे मिलता है उसे अमृत समझ कर लोग पीते हैं.फिर भी इस पानी से गांव के लोगों का काम नहीं चलता.मजबूरन गांव के लोग पास के एक झरने से जमा हुआ पानी लाते हैं जो बेहद गंदा होता है. 

    जिन पानी को लोग पीने में इस्तेमाल कर रहे हैं उसे जानने के बाद कितने कीड़े निकल रहे हैं

      जिस जमे पानी को लोग पीने में इस्तेमाल कर रहे हैं उसे जानने के बाद कितने कीड़े निकल रहे हैं.इस तरह का पानी पीने से उनका बीमार पड़ना लाजमी है.जिस जगह पर यह गांव बसा है वहां आस पास इलाज की कोई व्यवस्था ही नहीं है. गंदा पानी पीने से अक्सर लोग बीमार पड़ते हैं. ज्यादा स्थिति खराब होने पर उन्हें खाट पर टांग कर तालझारी या बोरियो अस्पताल लाना होता है.इनके पास उतने पैसे भी नहीं होते कि प्राइवेट अस्पताल में इलाज करा पाये.सरकारी अस्पताल में जो भी इलाज होता है. वही इनकी जिंदगी है.क्योंकि इनके पास आय की कोई सुविधा नहीं है.जंगलों की लकड़ियां काटते हैं और तालझारी और आसपास के बाजार में बेचते हैं.अनुमान लगाया जा सकता है जलावन की लकड़ी बेचकर ये कितना कमा पाते होंगे.सप्ताह में एक से दो सौ रुपये कमा लेते हैं तो इनके लिए वो बड़ी बात होती है.   

     राजस्व का 30 फीसदी सालाना इनपर खर्च किया जाय तो इनकी जिंदगी संवर सकती है

      जिस इलाके में खनन होता है,सरकार को उससे प्राप्त होनेवाले राजस्व के 30 फीसदी का हिस्सा खनन क्षेत्रों के आसपास के इलाकों में व्यवस्था के नाम पर खर्च किया जाता है.पगार पहाड़ और बालको पहाड़ के  आसपास पत्थर खदान हैं.यहां से सरकार को सालाना शायद करोड़ों के राजस्व की प्राप्ति होती है.यदि इस राशि का 30 फीसदी सालाना इनपर खर्च किया जाय तो इनकी जिंदगी संवर सकती है,लेकिन ऐसा होता नहीं है.यह 30 फीसदी राशि किसके पेट में जाती है,आप सोच सकते हैं.यदि कोई जनप्रतिनिधि या सिस्टम के अफसर अगर कहे कि इन 30 फीसदी राशि को गांव वालों के विकास के लिए खर्च किया जाता है तो या तो अफसर व नेता झूठ बोल रहे या फिर वही इस राशि को गटक रहे हैं.क्योंकि यदि इस गांव के विकास के लिए राजस्व को 30 फीसदी राशि खर्च की जाती तो आज इन गांव के लोगों को कीड़े वाला पानी नहीं पीना पड़ता, एक बाल्टी पानी के लिए घंटों कुएं में उतर कर जमना नहीं पड़ता.जिला पेयजल पदाधिकारी गोविन्द कच्छप-ने कहा कि पहाड़ियों पर रहनेवाले पहाड़िया ग्रामीणों के लिए सरकार द्वारा संचालित बहुत सारी योजनाएं है.और बात रही पागार पहाड़ की तो वहां पर पहले भी हमलोगों के द्वारा बोरिंग करने का प्रयास किया गया था.लेकिन सफलता नहीं मिली.हमलोग पुनः एक सप्ताह के अंदर पागार पहाड़ में बोरिंग करेंगे और ग्रामीणों को सिद्ध पानी उपलब्ध कराएंगे. 

     रिपोर्ट-गोविंद ठाकुर 


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