SARHUL : प्राकृतिक का पर्व सरहुल, पूजा के साथ ही तय होता है इस साल कैसी होगी वर्षा और खेती,जानिए इस त्योहार का महत्व   

    SARHUL : प्राकृतिक का पर्व सरहुल, पूजा के साथ ही तय होता है इस साल कैसी होगी वर्षा और खेती,जानिए इस त्योहार का महत्व   

    रांची(RANCHI): झारखंड अपनी आदिवासी  परम्परा, भाषा, अलग रहन - सहन, और विशेष संस्कृति के लिए काफी प्रसिद्ध है. झारखंड में लगभग 32 जनजातियाँ हैं जिनके धार्मिक  और पारंपरिक भोजन के साथ पहनावें अलग अलग है. इन जनजातियों की महत्वपूर्ण विशेषता है कि ये प्रकृति के प्रति बहुत प्रेम रखते हैं. आदिवासी समाज का एक मुख्य त्योहार सरहुल हैं. जिसे चैत्र मास के शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है.  इस त्योहार के दिन प्रकृति की पूजा की जाती है. यह पर्व नए साल की शुरुआत का उत्सव भी है. इस साल 11 अप्रैल को सरहुल पर्व पूरे झारखंड में मनाया जाना हैं. इस त्योहार में पेड़ों और प्रकृति के अन्य तत्वों की पूजा शामिल होती है.  खास कर सखुआ वृक्ष की पूजा की जाती है.

    मालूम हो कि यह पर्व आदिवासी का सबसे बड़ा पर्व है. सरहुल झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के आदिवासी क्षेत्रों में मनाया जाता है. वहीं झारखंड में सरहुल के पर्व में पूरे आदिवासी समाज में अलग ही उत्साह रहता है. सारे लोग झूमते गाते रांची के सड़को पर सोभा यात्रा भी निकालते है इस सोभा यात्रा को देखने के लिए देश विदेश से भी लोग रांची के सड़को पर पहुंचते हैं और रांची में लाखो की भीड भी उमंडती है

    क्या है सरहुल पर्व

    बता दे कि सरहुल पर्व को लेकर कई तरह की कथाएं और कहानियां है. जहां सरहुल का सीधा मतलब पेड़ की पूजा करना है. सरहुल त्योहार तब मनाया जाता है जब सखुआ  के पेड़ में नए पत्ते और फूल आते हैं.  अपने देवता को अर्पण करने से पहले इस मौसम में कोई फल, फूल या धान नहीं खाना शुरू करते हैं.  सरहुल के पूजा के लिए सखुआ के फूल , फल और महुआ के फलों को सरनास्थल पर लाए जाते हैं, जिसके बाद पाहान और देउरी आदिवासी जनजातियों के सभी देवताओं की पूजा करते है. झारखंड के जनजातीय समुदाय के लोग इस पर्व को मनाने से पहले नए फल ग्रहण नहीं करते है. बता दे कि पाहान कहते है कि सरहुल की पुजा के बाद  हवा-वर्षा का भी शगुन देखा जाता है और खेती ठीक होगी या नहीं.

    सरहुल झारखंड में आदिवासीयों का उत्सव

    झारखंड में आदिवासी इस उत्सव को उत्साह और उंमग के साथ मनाते है. ग्रामीण इसे समुदाय के रूप में मनाते हैं और एक साथ प्यार और भाईचारे की भावना को बढ़ावा देते हैं.  वहीं इस त्यौहार के दौरान जनजातीय पुरुष, महिला और बच्चें आदिवासी परम्परा परिधानों में तैयार होते है और पारंपरिक नृत्य करते है. एवं आदिवासी पीसे हुए चावल और पानी का मिश्रण अपने चेहरे पर और सिर पर सखुआ के फुल लगाते हैं, और फिर सरना स्थल के आखड़ा में नृत्य करते हैं.

    रिपोर्ट: महक मिश्रा  


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