कोल् इंडिया के लिए पढ़िए -कैसे चुनौती बनेंगे कैप्टिव और कमर्शियल कोल  ब्लॉक!

    कोल् इंडिया के लिए पढ़िए -कैसे चुनौती बनेंगे कैप्टिव और कमर्शियल कोल  ब्लॉक!

    धनबाद(DHANBAD) | भारत की कोयला  उत्पादक कंपनी कोल इंडिया और इसकी अनुषंगी  कंपनियों की परेशानी आगे बढ़ने वाली है.  कोयले की बिक्री में अब कोल्  इंडिया का मोनोपोली नहीं चल सकती है. प्राइवेट प्लेयर से कंपनी को चुनौती मिल सकती है. कैप्टिव  और कमर्शियल कोल्  ब्लॉक से तगड़ी चुनौती मिलने से इंकार नहीं किया जा सकता है.  इससे कोल इंडिया की  आमदनी भी प्रभावित हो सकती है.  कैप्टिव  एवं कमर्शियल कोल्  ब्लॉकों से अब धीरे-धीरे कोयले का उत्पादन होने लगा है.  ऐसे में कई बड़ी कंपनियां, जो कोयला खरीदती  थी , वह खुद से उत्पादन करने लगी है.  एक आंकड़े के मुताबिक अब तक कोयला मंत्रालय ने 575 मिलियन टन  की क्षमता वाली 161 खदानों की नीलामी की है.  58 खदानों को खोलने की अनुमति भी मिल गई है.  54 खदानें पहले से चालू है.  पिछले वित्तीय वर्ष में इन खदानों से कुल 147 मिलियन टन कोयले का उत्पादन हुआ था.  यह  देश के कुल कोयला उत्पादन का 15% है.  चालू वित्तीय वर्ष में यह आंकड़ा बढ़ सकता है.  एनटीपीसी, पश्चिम बंगाल पावर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड, पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड, कर्नाटक पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड, वेदांता , हिंडालको ,अदानी आदि जैसे बड़े उपभोक्ता फिलहाल है.  जिन्हें कोल ब्लॉक आवंटित किया गया है. 

    तो घटने लगेगी कोल् इंडिया के कोयले की मांग 
     
    इनके कोल्  ब्लॉक से उत्पादन शुरू होते ही यह  कंपनियां कोल इंडिया से कोयला खरीदना बंद कर देगी.  ऐसे में कोल इंडिया का कोयले की बिक्री पर एका धिकार  नहीं रहेगा.  मूल्य का भी दबाव रहेगा.  मतलब प्राइवेट प्लेयर्स कोल इंडिया के लिए मुसीबत बन सकते है. इधर , 50 सालों से अधिक समय के बाद झरिया और रानीगंज की बंद भूमिगत कोलियरिया   फिर से निजी हाथों में गई है.  कोल इंडिया ने 23 ऐसी खदानों को निजी हाथों में सौंप दिया है. और भी सौपें जाने की तैयारी चल रही है.  जानकारी निकल कर आ रही है कि कोल इंडिया  बंद पड़ी कोयला खदानों से राजस्व बढ़ाने के लिए इन बंद पड़ी 23 भूमिगत खदानों को निजी हाथों में दे दिया है.  असुरक्षित या अधिक खनन खर्च की वजह से कोल इंडिया इन कोयला खदानों को राजस्व साझेदारी या माइंस  डेवलपर एंड ऑपरेटर मोड पर चलाने  को दी है.  इन 23 खदानों में अधिकतर खदान देश के सबसे पुराने खनन क्षेत्र झरिया और रानीगंज की माइंस है.  कहने  को तो कोल इंडिया की मनसा घरेलू कोयले का उत्पादन बढ़ाने और राजस्वृ द्धि का है.  यह बात भी सच है कि झरिया और रानीगंज की पुरानी बंद खदाने   कुछ जटिल प्रकृति की है.  कुछ खदानें तो गैसीय भी है.  

    हाल ही में 23 खदानें दी गई है प्राइवेट प्लयेरो  को 

    कोल इंडिया की ओर से चिन्हित की गई 23 खदानों के साथ ऐसा किया गया है.  इनमें अधिकांश खदाने  भूमिगत यानी अंडरग्राउंड माइन्स है. 
     इन खदानों की कुल सालाना क्षमता 3.414 करोड़ टन निर्धारित किया गया है.  जबकि इन खदानों से खनन के लिए  भंडार 63.5 करोड़ टन होने का अनुमान है.  कोल इंडिया धीरे-धीरे अब निजीकरण की ओर बढ़ रही है.  5 साल में 90% के लगभग अगर यह सब व्यवस्था चली जाए, तो कोई आश्चर्य नहीं है.  सूत्र  बताते हैं कि कोल इंडिया कुल  34 खदानों को चिन्हित किया है.  जिनसे  उत्पादन नहीं हो रहा था , लेकिन वहां अच्छी गुणवत्ता का कोयला है.  कोल इंडिया यह  मानकर चल रही है कि इन कोलियरियों से प्रोडक्शन उत्पादक कंपनी के लिए फायदे का सौदा  नहीं हो सकता है.  इसलिए, प्राइवेट कंपनियों को दिया  जा रहा है.  इन 34 खदानों में ईसीएल   और भारत को किंग कोल्  लिमिटेड की 10-10 खदानें है.  वेस्टर्न कोलफील्ड के पास पांच, साउथ ईस्टर्न कोल फील्ड के पास  चार , महानदी कोलफील्ड  लिमिटेड के पास तीन और सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड के पास दो खदानें है.

    रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो   


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