सरहुल को लोकप्रिय बनाने में रामदयाल मुंडा की अहम भूमिका, देशज परंपरा की रखी थी नींव, पढ़ें पूरी कहानी 

    सरहुल को लोकप्रिय बनाने में रामदयाल मुंडा की अहम भूमिका, देशज परंपरा की रखी थी नींव, पढ़ें पूरी कहानी 

    रांची (RANCHI): पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडा की आज जयंती है. 23 अगस्त 1939 में रांची जिले के  दिउड़ी तमाड़ में उनका जन्म हुआ था. जबकि 30 सितंबर2011 को  72 वर्ष में निधन हो गया. उन्होंने आदिवासियों के सांस्कृतिक उत्थान के लिय अपनी बौद्धिकता सिद्ध की. अपनी माटी के लिय उन्होने ताउम्र जज्बे को बरकरार रखा. राज्य के जाने माने डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार  बीजू टोप्पो और  मेघनाथ ने वर्ष 2017 में नाची से बाची टाइटल से रामदयाल मुंडा के जीवन पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी. वो हमेशा कहते थे की जे "नाची से बाची". आज भी अदिवासियों के जेहन में ढोल नगाड़े, मांदर, और बांसुरी बजाते हुए छवि ही  रामदयाल मुंडा की है. झारखंड की कला, संस्कृति और परंपरा को अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया से लेकर सोवियत संघ तक ले गए. अपने जीवन के अन्तिम क्षण तक लोक संगीत, लोक कलाकारों के लिय कार्य किया, अंतरराष्ट्रीय मंच तक पारंपरिक संगीत को पहुंचाने का कार्य किया. वर्ष 2007 में संगीत नाटक एकेडमी के सम्मान से उन्हें सम्मानित किया गया था. 

    2010 में बने राज्यसभा सदस्य 


    जीवन के अन्तिम  पड़ाव में उनके राज्य के लिए निष्ठा और अपनी माटी से लगाव को देखते हुए उन्हें सर्वदलीय मत से 22 मार्च 2010 को राज्यसभा के लिए चुना गया. वर्ष 2010 में ही उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया.  जिस यूनिवर्सिटी से उन्होने पढ़ाई की उसी  रांची यूनिवर्सिटी में VC बनकर भी उन्होने अपना योगदान दिया था. 1982 में रांची यूनिवर्सिटी में जनजातीय क्षेत्रीय भाषा विभाग की स्थापना कराई थी. रांची के मोरहाबादी मैदान में रामदयाल सिंह मुंडा की 9 फीट की प्रतिमा लगाई गई है.

    कर्मा और सरहुल पर्व को लोकप्रिय बनाने का किया काम 

    झारखंड के साहित्यकारों को हिंदी और इंग्लिश के दायरे से निकालकर अपनी मूल भाषा में रचनाशीलता को बढ़ाने में लालसा बढ़ाने में अहम योगदान दिया है. अपने भाषा के प्रतf अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बुद्धिजीवी के रूप में कार्य किया है. राज्य की देशज परंपरा को कायम रखने के लिए अहम भूमिका का निर्वहन किया है. झारखंड के पर्व सरहुल और कर्मा को  लोकप्रिय बनाने में भी उन्होने अहम भूमिका निभाई है.

    बिलायत से ली थी पीएचडी की उपाधि

    प्रारंभिक शिक्षा अमलेसा लूथरीन मिशन स्कूल तमाड़ से हासिल की थी. माध्यमिक शिक्षा खूंटी हाई स्कूल  से और स्नातकोत्तर की शिक्षा रांची युनिवर्सिटी से ग्रहण की थी. आगे की शिक्षा दीक्षा के लिए अध्ययन और शोध कार्य करने के लिय शिकागो यूनीवर्सिटी अमेरिका चले गए थे. जहां उन्होने भाषा विज्ञान में 1963 से 1968 में पीएचडी की डिग्री हासिल की थी.


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