देश की नवरत्न कोयला कंपनी कोल इंडिया की सहायक कंपनी BCCL और CCL में उत्पादन घटा, जानिए क्या है वजह!


धनबाद(DHANBAD),: कैप्टिव और कमर्शियल माइनिंग का सीधा असर अब महारत्न कंपनी कोल् इंडिया पर पड़ रहा है. महारत्न कंपनी कोल इंडिया की दो बड़ी इकाइयों बीसीसीएल और सीसीएल में उत्पादन - डिस्पैच घट गया है. उत्पादन घटने की इस वर्ष सर्वाधिक बरसात होना भी एक वजह है. लेकिन डिस्पैच में भी कमी आई है. इसकी वजह है कि कंपनियों को कोयले के खरीदार नहीं मिल रहे हैं. कोयला कंपनियां तो अब कोयले के मूल्य में भी कटौती करने की तैयारी कर रही है. अभी हाल ही में कोलकाता में हुए सीएमडी मीट में सहायक कंपनियों के सीएमडी को स्वतंत्र कर दिया गया है कि वह अपने मुनाफे और परिस्थिति के अनुसार कोयले के मूल्य में कमी कर सकते हैं.
कोयले के दाम में भी हो सकती है कमी, जानिए कारण
हालांकि, अभी तक कोयले के मूल्य में कमी करने की कोई सूचना नहीं मिली है. बीसीसीएल की अगर बात की जाए तो इसका इलाका आग प्रभावित है. अवैध खनन भी बड़ी समस्या है. फिलहाल बाजार और कोयले की मांग और आपूर्ति में असंतुलन है. जिस वजह से कोयले की नीलामी कम हो रही है. जिसका असर कंपनी के मुनाफे पर पड़ रहा है. दरअसल, बीसीसीएल और सीसीएल के कोयले के सबसे बड़ा उपभोक्ता पावर प्लांट हैं. पावर प्लांट अब इंटरेस्ट नहीं दिखा रहे हैं. नतीजा है कि कोयले की मांग में कमी आ रही है.
बीसीसीएल में अब कॉस्ट कटिंग की हो रही तैयारी
उत्पादन और डिस्पैच में समस्या की वजह से कोल इंडिया की सबसे बड़ी इकाई बीसीसीएल में अब कॉस्ट कटिंग की तैयारी शुरू कर दी गई है. अभी हाल ही में हुई बैठक में वाहनों के गैर जरूरी उपयोग कम करने का निर्देश महाप्रबंधकों को दिया गया है. इसके साथ ही संडे और ओवर टाइम में भी कटौती करने का प्रस्ताव है. इसके अलावा डैमेज को भी कम करने के उपाय करने को कहा गया है. कंपनी संडे, ओवर टाइम और डैमेज में करोड़ों रुपए का भुगतान करती है. सूत्रों के अनुसार कोयले की मांग में कमी के कारण बीसीसीएल को आर्थिक परेशानी हो रही है. कॉस्ट कटिंग के जरिए इस पर कुछ हद तक नियंत्रण की कोशिश की जा रही है. सूत्रों के अनुसार बीसीसीएल चालू वित्तीय वर्ष में उत्पादन लक्ष्य प्राप्त करने में असफल हो सकती है.
बीसीसीएल को 45 मिलियन टन का लक्ष्य निर्धारित,पहुंचना कठिन
बीसीसीएल को 45 मिलियन टन का लक्ष्य निर्धारित है. बीसीसीएल शेयर मार्केट में सूचीबद्ध हो गई है. इस वजह से भी कंपनी मैनेजमेंट पर प्रोडक्शन बढ़ाने का बड़ा दबाव है. अब देखना है कि आगे होता है क्या? जानकारी के अनुसार कई पावर कंपनियां फ्यूल सप्लाई एग्रीमेंट के अनुसार कोयला नहीं उठा रही है. इसकी वजह कैप्टिव और कमर्शियल माइनिंग से कोयले की उपलब्धता है. कई पावर प्लांट को कैपटिव और कमर्शियल खदानों से आसानी से कोयला मिल जा रहा है. कोयले की गुणवत्ता भी अच्छी रह रही है. इधर, कोल इंडिया की अनुषंगी कंपनियों के कोयले की गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं. अभी हाल ही में यह बात सामने आई थी कि पावर प्लांट कंपनियां कोयले की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए कोयला लेने से इनकार कर दिया था.
झारखंड में संचालित कोयला कंपनियों का डिस्पैच में कमी हुई है
दरअसल, झारखंड में संचालित कोयला कंपनियों का डिस्पैच पिछले साल की इस अवधि से कम है. जानकारी के अनुसार ईसीएल में डिस्पैच दर 4.15% नेगेटिव है, जबकि बीसीसीएल में 8.92% नेगेटिव है. सीसीएल में भी 15.74% ग्रोथ निगेटिव है. हालांकि पहले से ही यह संभावना व्यक्त की जा रही थी कि कैप्टिव और कमर्शियल माइनिंग की वजह से कोल इंडिया का एकाधिकार पर असर पड़ सकता है और वही अब हो रहा है. अभी तक कोयला उत्पादन और बिक्री में कोल इंडिया की मॉनोपोली थी. जब जैसा चाहा, नियम बना लिया, जब जैसा चाहा, दर निर्धारित कर दिया। लेकिन अब उसे बड़ी चुनौती मिल रही है और इस चुनौती का सामना करना कोल इंडिया के लिए बहुत बड़ा चैलेंज है. इस चैलेंज को कोल् इंडिया कैसे निबटेगा , यह देखने वाली बात है. लेकिन फिलहाल कोयले की दर में कमी की बात लगभग तय हो गई है और ऐसे में घट सकती है कोयले की कीमत।
रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो
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