हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल हैं दुमका के मो. समीम, पढ़ें कैसे पिछले 63 सालों से दुर्गा माता की सेवा भक्ति में है लीन

    हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल हैं दुमका के मो. समीम, पढ़ें कैसे पिछले 63 सालों से दुर्गा माता की सेवा भक्ति में है लीन

    दुमका(DUMKA):शारदीय नवरात्र का त्यौहार चल रहा है. अष्टमी तिथि को माँ के महागौरी स्वरूप की पूजा हो रही है. दुमका के दुर्गा मंदिरों और पूजा पंडालों में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी है. हर तरफ भक्ति का माहौल है, या देवी सर्व भूतेषु के मंत्र गूंज रहे है. बचपन से हम लोग एक गाना सुनते आ रहे है "मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना". प्रसिद्ध शायर मोहम्मद इकबाल ने सन् 1905 में इसे लिखा था. सबसे पहले लाहौर के सरकारी कॉलेज में इसे पढ़ कर सुनाया था.ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारतीयों को एकता के सूत्र में पिरोने के लिए लिखा गया यह गीत आज भी उतना ही प्रासंगिक है. इसके बाबजूद मजहब के नाम पर जगह जगह दंगा फसाद की खबरें आती है, लेकिन आज हम आपको शारदीय नवरात्र की एक ऐसी तस्वीर दिखा रहे हैं जो मो. इकबाल की सोच पर शत प्रतिशत खरे उतर रहे हैं.

    हिंदू मुस्लिम एकता की मिसाल है दुमका के मो. समीम

     हाथों में झाड़ू लेकर मंदिर परिसर की सफाई कर रहे इस शख्स का नाम है मो. समीम और यह नजारा है जिले के जामा प्रखंड के बारा पलासी स्थित दुर्गा मंदिर का. माता रानी के प्रति समीम की आस्था ऐसी है कि ना केबल शारदीय नवरात्र में बल्कि यूं कहें कि सालों भर समीम की दिनचर्या की शुरआत मंदिर परिसर की साफ सफाई से शुरू होती है.समीम प्रत्येक दिन सुबह 3 बजे जगने के बाद मंदिर पहुँचते हैं. माता रानी के आगे शीश झुकाते हैं और हाथों में झाड़ू लेकर पूरे मंदिर परिसर की सफाई करते है. बाप दादा की विरासत को वे आगे बढ़ा रहे है. जीवन के 63 बसंत देख चुके समीम कहते है कि आज भी वे अपने आप को एक युवा की भांति ऊर्जावान समझते हैं.उनकी उम्र के लोग या तो बीमार होकर बिस्तर पर पड़े हैं या फिर दुनिया को अलबिदा कह चुके हैं, लेकिन समीम पूरी तरह फिट है.

    पिछले 63 सालों से दुर्गा माता की  सेवा भक्ति में है लीन

     समीम की आस्था सिर्फ माता रानी के प्रति ही नहीं बल्कि तमाम हिन्दू देवी देवताओं पर है. शमीम कहते हैं कि वे पेशे से ड्राइवर थे. जब तक वे यात्री वाहन चलाते थे तो सावन की प्रत्येक सोमवारी को अपनी सवारी गाड़ी से ग्रामीणों को शिवालय ले जाकर पूजा कराते थे. उनसे कोई भाड़ा नहीं लेते थे. एक दर्जन संतान के पिता समीम आज हर तरह से खुशहाल हैं. उनका मानना है कि धर्म के नाम पर दीवार खड़ी करना उचित नहीं है. सभी इंसान हैं.

    वैष्णवी दुर्गा मंदिर होने की वजह से यहां बली नहीं पड़ता है

    बारा पलासी दुर्गा पूजा कमिटी के उपाध्यक्ष गुलाब राय बताते हैं कि वर्ष 1908 से यहां दुर्गा पूजा होती है. वैष्णवी दुर्गा मंदिर होने की वजह से यहां बली नहीं पड़ता है. लोगों की आस्था का केंद्र बिंदु है. अष्टमी से यहां काफी भीड़ उमड़ती है. माता रानी सबों की मनोकामना पूरी करती है.समीम के बाबत कहते हैं कि साम्प्रदायिक सौहार्द जा यह अनूठा उदाहरण है.मो. समीम की कार्यशैली धर्म के वैसे कथित ठेकेदारों के गाल पर करारा तमाचा है जो धर्म की दीवार खींच कर हिन्दू मुश्लिम को आपस मे लड़ाते हैं.

    रिपोर्ट-पंचम झा


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