Lohardaga Lok Sabha Seat: काफी रोमांचक है लोहरदगा लोकसभा सीट का इतिहास, 1957 से बीजेपी और कांग्रेस के बीच होती रही है सीधी टक्कर

    Lohardaga Lok Sabha Seat: काफी रोमांचक है लोहरदगा लोकसभा सीट का इतिहास, 1957 से बीजेपी और कांग्रेस के बीच होती रही है सीधी टक्कर

    गुमला(GUMLA): लोकसभा चुनाव 2024 की घोषणा हो चुकी है, जिसको लेकर सभी राजनीतिक पार्टियां इसकी तैयारी में जुट गई है, वहीं झारखंड में भी जोर शोर से इसकी तैयारी चल रही है.वहीं झारखंड में बीजेपी ओर इंडिया गठबंधन के बीच राजनीतिक घमासान मचा हुआ है. वहीं यदि झारखंड के कुल लोकसभा सीटों की बात करें तो यहां 14 सीट है. जिसमे से लोहरदगा लोकसभा सीट भी एक है. अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित इस सीट का इतिहास काफी रोमांचक रहा है. 1957 में इस सीट को गठित किया गया था. शुरू में इस सीट से झारखंड पार्टी के उम्मीदवार ने जीत हासिल की थी, उसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस सीट पर अपनी जीत को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से ब्रिटेन में कार्यरत इंजीनियर स्वर्गीय कार्तिक उरांव को लेकर इस सीट से चुनाव लड़वाया था जो पहली बार तो हार गए थे लेकिन दुबारा उन्होंने जीत हासिल की थी.  

    2009 के बाद से 2024 तक लगातार तीन बार बीजेपी के सुदर्शन भगत सांसद रहे

    वहीं दो बार कार्तिक उरांव लोहरदगा सीट से सांसद रहने के साथ ही केंद्र में मंत्री भी रहे थे उनकी मौत के बाद उनकी पत्नी स्वर्गीय सुमति उरांव ने इस सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की थी, कार्तिक उरांव और सुमति उरांव की बेटी गीताश्री उरांव आज कांग्रेस में है, जबकि दामाद डॉ अरुण उरांव बीजेपी में है, वहीं कांग्रेस के हाथों से इस सीट को बीजेपी के नेता स्वर्गीय ललित उरांव ने छीन ली थी, बीजेपी के हाथों से कांग्रेस नेता डॉ रामेश्वर उरांव ने फिर से कांग्रेस के झोली में लायी थी,उसके बाद 2009 के बाद से 2024 तक लगातार तीन बार बीजेपी के सुदर्शन भगत सांसद रहे.इस बार जहां बीजेपी ने राज्यसभा के पूर्व सांसद समीर उरांव को मैदान में उतारा है, वहीं महागठबंधन की ओर से कांग्रेस ने सुखदेव भगत को उतारा है जिनके बीच अब तक सीधा मुकाबला है.  

    इलाके में लोगों को आज भी कई तरह की मूलभूत समस्याओं से जूझना पड़ता है

    आपको बताये कि झारखंड में पांच विधानसभा सीट लोहरदगा,गुमला,सिसई, बिशुनपुर और मांडर वाला यह क्षेत्र पूरी तरह से आदिवासी बहुल पिछड़ा हुआ क्षेत्र है, जहां समस्याओं की भरमार है, इलाके में गरीबी बेरोजगार और पलायन बहुत बड़ी समस्या है. यहां के लोग पूरी तरह से मानसून की बारिश पर ही खेती करते है. इलाके में बाक्साइड के माइंस है, लेकिन उसका लाभ इलाके के गरीब लोगों को सही रूप से नहीं मिल पाता है,इलाके में लोगो को आज भी कई तरह की मूलभूत समस्याओ से जूझना पड़ता है. एक समय था कि यह इलाका नक्सलियों और अपराधियो के गढ़ के रुचि में चिन्हित था,इस बार किस पार्टी को यहां जीत मिलती है यह तो आने वाला समय ही बताएगा.  

    रिपोर्ट-सुशील कुमार  



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