राज्यपाल के अधिकारों पर क्यों कैंची चलाना चाहती है सरकार! विधानसभा के मॉनसून सत्र में यूनिवर्सिटी बिल लाने की तैयारी, जानिए इनसाइड स्टोरी

    राज्यपाल के अधिकारों पर क्यों कैंची चलाना चाहती है सरकार! विधानसभा के मॉनसून सत्र में यूनिवर्सिटी बिल लाने की तैयारी, जानिए इनसाइड स्टोरी

    रांची(RANCHI): झारखण्ड विधानसभा का मॉनसून सत्र एक अगस्त से शुरू होने वाला है. इसमें पांच दिनों का कार्य दिवस है. इस छोटे सत्र में सरकार कई विधेयक सदन में पेश करेगी. जिसमें सबसे ज्यादा चर्चा विश्वविद्यालय विधेयक 2025 की है. इस विधेयक के सदन से पास होने के बाद विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति से लेकर अन्य सभी पदाधिकारियों की नियुक्ति समेत अन्य काम में सीधा सरकार का हस्तक्षेप होगा. राज्यपाल इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकेंगे. ऐसे में अब यह जानना जरुरी है कि आखिर इस विधेयक के पेश करने की जरुरत क्यों पड़ी. साथ ही इसके अंदर की कहानी क्या है, और किसे फायदा होने वाला है.

    अगर देखें तो किसी भी राज्य में विश्वविद्यलय में नियुक्ति या कुलपति का मामले को राजयपाल ही देखते है. एक ऐसा अधिकार राज्यपाल के पास होता है. जिससे वह विश्वविद्यालय के प्रमुख रहते है. लेकिन हाल के कुछ साल में कई राज्यों ने इसमें बदलाव किया है. बंगाल में भी 2022 में विधेयक लाया गया था. जिसमें राज्य्पाल के जगह मुख्यमंत्री विश्वविद्यालय के प्रमुख हो गए. साथ ही कई शक्ति राज्य सरकार को मिली.                    

    झारखण्ड में विश्वविद्यालय विधेयक को 24 जुलाई को हेमंत कैबिनेट से पास किया गया. इसके बाद इसे विधानसभा में पेश किया जायेगा. सदन से भी बड़े ही आराम से यह पास हो जायेगा, क्योंकि आंकड़ों का खेल है और इसमें राज्य में पूर्ण बहुमत के साथ हेमंत सोरेन राज्य की बागडोर चला रहे है. ऐसे में सवाल यह है कि आखिर इस विधेयक के आने से कैसे और क्या बदल जायेगा. सबसे पहले देखें तो अब तक झारखण्ड में विश्वविधायल के अधिकतर मामलो में गवर्नर का सीधा हस्तक्षेप होता है. पूर्व से जो परंपरा चली आ रही है. उसी पर झारखण्ड बढ़ रहा है. ऐसे में यह बड़ा बदलाव होगा.

    विश्वविद्यालय विधेयक के पास होने के बाद जो इसमें नियम बनाये गए है. उसमें कुलपति की नियुक्ति से लेकर वित्तीय सलाहकार तक की नियुक्ति राजभवन से ना हो कर मुख्यमंत्री सचिवालय से होगी. इस पूरे मामले का अधिकार सरकार के पास आ जायेगा. जिससे राज्य्पाल के अधिकार में कमी आएगी. इस विधेयक के बाद झारखण्ड में विश्वविद्यालय के सभी मामलो में सरकार सीधा हस्तक्षेप करेगी. समीक्षा से लेकर सभी निर्णय सरकार के बिना आदेश का नहीं हो पायेगा.

    अब यह सवाल है कि आखिर इस विधेयक की जरूरत क्यों पड़ी है. इसके पीछे जानकर बताते हैं कि झारखण्ड एक अलग तरीके का राज्य है. यहां की पृष्भूमि अन्य राज्य से बिल्कुल अलग है. साथ ही विश्वविद्यालय में बहुत सारे ऐसे काम होते है. जिसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है. अगर विश्वविद्यालय के कुलपति कुछ गलत निर्णय भी लेते है तो इसमें कोई कुछ नहीं करता. इससे यह होगा कि अब कोई गलती पर तुरंत एक्शन देखने को मिलेगा. साथ ही कई जगहों पर  सेसन पीछे चल रहा है. इससे छात्र का भविष्य खतरे में पड़ता है. जो बिल पास होने से समय पर होगा.

    वहीं इस विधेयक को लेकर झारखण्ड में सियासी सरगर्मी भी तेज है. सत्ता पक्ष इसे राज्य के हित का विधेयक बता रही है तो विपक्ष इसके पीछे सरकार की मंशा पर सवाल उठा कर घेरने में जुटी है. सरकार का मानना है कि इस विधेयक से झारखण्ड का भला होगा. साथ ही विश्वविद्यालय में कई सुधार देखने को मिलेगा.                              

     

     


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