Election 2024 : चुनाव परिणाम से पहले ही जयराम की हार ! झारखंड में नहीं मिल रही एक भी सीट, जानिए अंदर की कहानी   

    Election 2024 : चुनाव परिणाम से पहले ही जयराम की हार ! झारखंड में नहीं मिल रही एक भी सीट, जानिए अंदर की कहानी   

    रांची(RANCHI):  लोकसभा चुनाव परिणाम भले ही मंगलवार को आएगा. सुबह आठ बजे से मतगणना की प्रक्रिया शुरू होगी. लेकिन EXIT POLL के आकड़े जारी कर दिए गए है. सभी एजेंसी और चैनलों के अपने अपने दावे है. इस बीच झारखंड में इंडी गठबंधन,एनडीए के अलावा कई निर्दलीय उम्मीदवार भी मैदान में थे. सभी की किस्मत EVM में कैद है. लेकिन EXIT POLL के पूर्व अनुमान के मुताबिक सूबे में इंडी एनडीए के अलावा किसी के खाते में एक भी सीट नहीं जाती दिख रही है.खास चर्चा जयराम महतो को लेकर थी,जीत के दावे भी किए जा रहे थे. लेकिन अब शायद टाइगर को निराशा हाथ लग सकती है. 

    परिणाम ही बताएगा कितना दिल में उतरे जयराम

    झारखंड में छात्र आंदोलन से अपनी राजनीति जीवन की शुरुआत करने वाले जयराम महतो गिरीडीह से अपनी किस्मत आजमा रहे है. पूरा दम खम लोकसभा चुनाव में लगाया है. गिरिडीह ही नहीं बल्कि रांची,दुमका सीट पर भी जयराम ने अपने प्रत्याशी के पक्ष में खूब सभा और जनसम्पर्क किया था. लेकिन झारखंड में किसी का भी खाता खुलता नहीं दिख रहा है. जयराम महतो गिरिडीह,  देवेन्द्र महतो रांची से मैदान में थे. लेकिन EXIT पोल के नतीजों के अनुसार लग रहा है कि उनकी सीट हाथ से निकलती दिख रही है. हालांकि अब चुनाव परिणाम में ही साफ होगा कि आखिर कितने लोगों के दिल में जयराम और अन्य प्रत्याशी उतर पाए हैं. 

    भीड़ वोट में नहीं हुई तब्दील

    गिरिडीह में जब जयराम महतो चुनावी सभा कर रहे थे तो ऐसा लग रहा था की चुनाव एक तरफा है. हजारों की भीड़ जयराम की सभा में होती थी. जब काफिला निकलता था तो सैकड़ों गाड़ी साथ चलती थी. जब जयराम की गिरफ़्तारी के लिए पुलिस पहुंची तो उन्हे CRPF को लगाना पड़ा था. समर्थक फिर भी सभी के बीच से जयराम को निकाल कर चले गए थे. लेकिन भीड़ वोट में तब्दील नहीं हो पाई है. ले यह भीड़ बस सभा में साथ रही.      आकड़ों से साफ पता चल रहा है कि जनता के मुह पर कुछ और दिल में कुछ और था. तभी तो EXIT POLL में कही भी जयराम का चर्चा भी नहीं है.            

    लोकसभा चुनाव में नहीं बना स्थानीय मुद्दा

    लोकसभा चुनाव में आम तौर पर देश और केंद्र के मुद्दे उछलते है. इस बीच स्थानीय मुद्दे चुनावी शोर में गुम हो जाते है. बड़े नेता पहुंचते है और बड़े बड़े वादे कर चले जाते है. जनता भी केंद्र के मुद्दे को तरजीह देती है. शायद यही वजह है कि जयराम के साथ जनता नहीं जुड़ पाई.जयराम महतो शुरू से 1932,स्थानीय नीति और राज्य सरकार से जुड़े मुद्दे को उठाते दिखे है. चुनाव में भी बाहरी भीतरी के मुद्दे पर मैदान में थे. लेकिन यह मुद्दा विधानसभा चुनाव के लिए सही है. जो अब जयराम को भी मालूम चल रहा होगा. जब लोकसभा चुनाव की बात होती है तो देश के ज्वलंत मुद्दे गंभीरता के साथ उठाने पड़ते है.            


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