अंग्रेज गए अंग्रेजियत नहीं, गुलाम की तरह मजदूरों से काम लेकर मालिक ने नहीं दिया पगार, मजदूर आत्मदाह करने को मजबूर 

    अंग्रेज गए अंग्रेजियत नहीं, गुलाम की तरह मजदूरों से काम लेकर मालिक ने नहीं दिया पगार, मजदूर आत्मदाह करने को मजबूर 

    रांची(RANCHI):  झारखंड एक पिछड़ा राज्य है,और इस राज्य में सबसे बड़ी समस्या रोजगार की है. रोजगार की तलाश में यहाँ के युवा दर -दर  भटकते रहते है. कई बार रोजगार मिलने के बाद भी वेतन नहीं दिया जाता. ऐसे में भूखे पेट रहने को तमाम मजदूर मजबूर है. अग्रेज भले ही भारत से चले गए लेकिन अंग्रेजों की परछाई यहाँ के कुछ कंपनी के मालिक और अधिकारियों में बची हुई गए है.जिस तरह से अंग्रेजी हुकूमत यहाँ के लोगों पर जुल्म करती थी काम अधिक करा कर पगार ना के बराबर देती थी,और इसके खिलाफ किसी की हिमाकत नहीं होती थी की वह आवाज उठा सके. कुछ ऐसा ही हाल झारखंड की राजधानी रांची के टाटीसिलवे इलाके से सामने आई है.  

    श्रम विभाग के चौखट पर फ़रियाद लेकर पहुंचे

    राजधानी रांची के टाटीसिलवे इलाके में रस्सी फैक्ट्री है. यहाँ पूरी लगम और मेहनत से मजदूर काम करते हैं. ताकि उनका घर चल सके,बावजूद इसके कंपनी की ओर से समय पर वेतन का भुगतान नहीं किया जाता है. आखिर कार अब मजदूरों के पास कोई रास्ता नहीं बचा तो वह अब श्रम विभाग के अधिकारियों के चौखट पर पहुंच कर अपनी मांग रख रहे है. कंपनी में काम करने वाले यही मजदूर हैं जिनके बदौलत कंपनी का मालिक बड़े ही शान ओ शौकत के साथ बड़ी गाड़ी और बंगला में रहता है.लेकिन कंपनी में काम करने वाले मजदूर बदहाल हैं.

    भूखे सोने को मजबूर

    मजदूर हेमंत ने बताया कि किसी को तीन माह तो किसी को दो माह से वेतन का भुगतान नहीं किया गया है. दुर्गा पूजा का पर्व आ गया,अब भी पैसा नहीं मिलेगा तो फिर काम हमलोग क्यों कर रहे हैं यह सोचने वाली बात है.उन्होंने कहा कि अब घर का चूल्हा जलाना भी मुश्किल हो गया है. जिस दुकान से राशन लेते थे उसने भी राशन देना बंद कर दिया है. भूखे पेट सोने को मजबूर है.जिस किराए के मकान में रहते हैं वह भी खाली करने का दबाव बना रहा है. आखिर हम क्या करें,किसके पास अपनी फ़रियाद लेकर जाए. कोई सुनने वाला नहीं है,अगर हमारी मांग पूरी नहीं हुई तो आत्मदाह करने को मजबूर होंगे.                      


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