स्वायत परिषद के गठन की तिथि को माने सरकार, जानिए क्यों उठी यह मांग


धनबाद (DHANBAD): धनबाद के समाजसेवी व विभिन्न संगठनों के पदाधिकारी कुमार मधुरेंद्र सिंह ने झारखण्ड के मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर कहा है कि 15 नवंबर 2000 को प्रदेश में स्वायत परिषद का गठन हुआ था. उस लड़ाई के प्रमुख योद्धा दिशोम गुरु शिबू सोरेन हैं और स्वायत परिषद के अध्यक्ष भी रहे हैं. इसलिए विधानसभा सत्र में 1932 का मामला लाने से पूर्व , इस तारीख से रहने वाले बाशिंदों को यानी 15 नवंबर 2000 तक की तारीख की आबादी को भी इस 1932 खतियान वाले आदेश के काॅलम में जगह बना कर विधानसभा सत्र के पटल पर रखा जाये, इससे किसी की भी क्षति नहीं होगी.
अंग्रेजी शासनकाल में धालभूम स्टेट में था धनबाद
उन्होंने कहा है कि अंग्रेजी शासनकाल में धालभूम स्टेट हुआ करता था, कतरास गढ़, टुंडी, नगरकियारी इत्यादि इसमें शामिल थे. उसके बाद सभी को मिलाकर स्टेट का नाम मानभूम कर दिया गया. उसके बाद लंबे अंतराल के बाद मानभूम जिले से 1965 में धनबाद को हटाकर धनबाद जिले का निर्माण किया गया. आगे चलकर बोकारो को भी 1991 में धनबाद से काटकर अलग किया गया. धनबाद और बोकारो, जमशेदपुर जिला में ही आज भी कितने गांव का दायरा बंगाल में आता है. सही रूप से ना लोकसभा या विधानसभा क्षेत्र का बंटवारा आजतक नहीं हुआ है.
पहले जमीन देखिये फिर निर्णय कीजिये
उन्होंने कहा कि इस तरह की समस्या से निजात पहले पा लिया जाये और विधानसभा सत्र में चर्चा करने के बाद, इसे पूर्ण रूप से लागू करने को सोचा जाये. बिहार और बंगाल के समय से यानी 1932 के बाद इस क्षेत्र में नौकरी करते हुए बहुत लोग रिटायर हो चुके हैं और उनके परिवार आज भी भाड़े या कोई मकान बना कर रह रहे हैं, वह तो विधानसभा चुनाव और लोकसभा में मतदान करते रहे हैं, झारखंड में आपकी पार्टी या विपक्षी दल को वोट दे रहे हैं, तो आज से क्या वह सब रिफ्यूजी हो जाएंगे. जबकि अविभाजित बिहार के समय सबसे ज्यादा राजस्व झाररवण्ड से मिलता था. झाररवण्ड निर्माण के बाद झारखंड का जिस गति से विकास होना चाहिए था, नहीं हुआ. यह दुर्भाग्य की बात है. इसके लिए यहाँ के राजनेता एवं नेतृत्व जिम्मेवार है.
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