DHANBAD: अवैध उत्खनन से बदरंग हो गई है कोयलांचल के हजारों बच्चों की जिंदगी, क्या है मजबूरी, पढ़िए पूरी खबर


धनबाद(DHANBAD)- धनबाद जिले में 65% से अधिक स्कूली बच्चे ड्रॉपआउट हैं ,यह स्थिति तब है जब बच्चों को स्कूल से जोड़ने का अभियान समय-समय पर चलता रहता है. लेकिन इसका कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है कि कोयलांचल में कितने बच्चों की दिनचर्या कोयला चोरी करने अथवा कोयला चुनने से शुरू होती है और इसी से समाप्त होती है. कोलियरी क्षेत्रों और घरों में रहने वाले बच्चों का विकास ठप है. पढ़ने- लिखने और खेलने -कूदने की उम्र में यह कोयला चोरी अथवा कोयला चुनने के काम में लगे हुए है. यह काम कोई और नहीं बल्कि उनके अभिभावक ही कराते है. जिस भी कोयला खदानों के अगल-बगल बस्तियां बसी हैं ,उनके घरों की जिंदगी इसी से शुरु होकर इसी में समाप्त हो जाती है.
सगे- संबंधी भी लगे है कोयला चुनने में
बहुतों ने तो अपने सगे- संबंधियों को भी धनबाद बुलाकर इस काम में झोंक दिया है. बच्चों के विकास पर इसका क्या असर हुआ है या हो रहा है ,इसका सर्वे किसी एजेंसी द्वारा नहीं कराया जाना भी कोयलांचल का एक सच है. कोयलांचल में बाल श्रमिकों की बात तो खूब होती है ,स्कूल से ड्रॉपआउट बच्चों की भी होती रहती है. ड्रॉपआउट रोकने के लिए स्कूलों में मध्यान भोजन योजना शुरू की गई लेकिन क्या इसका बहुत सकारात्मक असर दिख रहा है. हर साल ड्रॉपआउट बच्चों को फिर से स्कूल से जोड़ने के लिए अभियान चलता है ,आंकड़े बढ़ाए जाते हैं लेकिन बच्चे दो-चार दिन स्कूल आते हैं और फिर कोयला चुनने में अपने माता पिता को सहयोग करने में लग जाते है. उनकी दुनिया ही कोयला बन गई है.
राष्ट्रीयकरण का मकसद रह गया अधूरा
यह अलग बात है कि इस कोयले से कोयलांचल में ढेरों खाकपति करोड़पति बन गए. अवैध उत्खनन कुटीर उद्योग का रूप ले लिया. बड़े-बड़े संगठन अवैध उत्खनन के काम में लग गए. इस धंधे से उन्हें अपार कमाई होने लगी. कोयला उद्योग के मजदूरों की जिंदगी सुधारने के लिए कोलियारियों का राष्ट्रीयकरण हुआ लेकिन क्या राष्ट्रीयकरण का असली मकसद कभी कामयाब हो पाया. आपको बता दें कि धनबाद में शिक्षा विभाग के सर्वे के मुताबिक कोरोना काल में 45000 बच्चे ड्रॉपआउट हुए थे. लेकिन इधर स्कूल खुलने के बाद लगभग 14000 बच्चे वापस आ गए है. धनबाद जिले में पहली से लेकर आठवीं तक के कुल 1727 सरकारी स्कूल है.
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