एयरपोर्ट के लिए फिर एक बार उठ खड़ा हुआ है धनबाद, 1987 तक सेवा थी, फिर बंद क्यों की गई, पूछ रहे सवाल

    एयरपोर्ट के लिए फिर एक बार उठ खड़ा हुआ है धनबाद, 1987 तक सेवा थी, फिर बंद क्यों की गई, पूछ रहे सवाल

    धनबाद(DHANBAD) : एयरपोर्ट के लिए धनबाद एक बार फिर सवाल कर रहा है. लड़ेगा धनबाद तो उड़ेगा धनबाद नारे के साथ धनबाद अपनी आवाज बुलंद कर रहा है. लोगों द्वारा एयरपोर्ट की मांग तेज कर दी गई है. सोशल मीडिया और विभिन्न प्लेटफार्म पर मांग कर चुके लोगों ने इस बार मिल कर नारा बुलंद करने को ठानी है. धनबाद एक ऐसा जगह है, जहां 1987 तक उड़ाने भरी जाती थी, कोलकाता, पटना और रांची के लिए हवाई सेवा थी, लेकिन उसके बाद इसे बंद कर दिया गया. झारखंड की ही बात करें तो देवघर सहित अन्य जगहों पर एयरपोर्ट की सुविधा दी गई लेकिन धनबाद में पहले जो सुविधा थी, उसे छीन लिया गया. धनबाद का दुर्भाग्य ही नहीं, धनबाद जिले के 28 लाख लोगों के लिए चुनौती भी है. क्योंकि कोई भी ऐसा अहर्ता नहीं है, जिसे धनबाद पूरा नहीं करता है, फिर भी यहां एयरपोर्ट की सुविधा नहीं दी गई. धनबाद में बीसीसीएल, सिंफर, डीजीएमएस सीएमपीएफ, आईआईटी आईएसएम, बीआईटी सिंदरी जैसे महत्वपूर्ण संस्थान है. सिंदरी खाद कारखाना बंद होने के बाद हर्ल कारखाना शुरू किया गया है. लेकिन यहां एयरपोर्ट की सुविधा नहीं है. बीसीसीएल कोल इंडिया की सबसे बड़ी इकाई है. डीजीएमएस एशिया महादेश का अकेला संस्थान है. इसका कोई जोड़ नहीं है, फिर भी यहां एयरपोर्ट की सुविधा नहीं है.

    लड़ेगा धनबाद तो उड़ेगा धनबाद

    लोग बताते हैं कि ऐसी बात नहीं थी कि उस समय उड़ानों के लिए पैसेंजर नहीं मिलते थे. रेलयात्री के अलावा हवाई जहाज से यात्रा करने वालों की संख्या भी कम नहीं थी. वैसे आर्थिक मामलों में धनबाद हमेशा समृद्ध रहा है. उद्योग धंधों की यहां बहुतायत रही है. यह बात अलग है कि आज उतने उद्योग धंधे नहीं है, धनबाद के बड़े बड़े बड़े कारोबारी विभिन्न कारणों से यहां से पलायन कर गए हैं. फिर भी यहां अभी भी लोगों की आर्थिक ताकत मजबूत है. बावजूद सिर्फ एक एयरपोर्ट के बिना बहुत सारे विकास नहीं हो पाते. लोग आने जाने से परहेज करते हैं. जनप्रतिनिधियों के लिए भी यह बड़ी चुनौती है. लड़ेगा धनबाद तो उड़ेगा धनबाद, जो अभियान शुरू किया गया है, यह यहां के कद्दावर नेताओं के मुंह पर तमाचा भी है और उनके कार्यकुशलता पर प्रश्नचिन्ह भी. देखना है यह अभियान क्या रंग लाता है.

    रिपोर्ट: सत्यभूषण सिंह, धनबाद


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