धनबाद DHANBAD): कोयला उद्योग में मजदूर हितों पर ताबड़तोड़ "हमले" किए जा रहे हैं. ऐसे में राजेंद्र प्रसाद सिंह की कोयला मजदूरों को याद आनी स्वाभाविक है. उनके जमाने में फैसला कोयला मजदूरों के हित में होते थे. छह बार के बेरमो से विधायक, बिहार से लेकर झारखंड तक मंत्री रहे. इंटक के राष्ट्रीय महामंत्री रहे राजेंद्र प्रसाद सिंह केवल एक पॉलिटिशियन नहीं, बल्कि कोयला मजदूरों के स्तंभ थे. कोयलांचल के बेरमो से राजनीति की शुरुआत करते-करते उन्होंने इंटक में भी बड़े पद पाए, तो बिहार से लेकर झारखंड तक मंत्री रहे.
काबिलियत ऐसी कि मंत्री पद आगे-पीछे चलता था
मंत्री भी किसी की दया पर नहीं, बल्कि अपनी काबिलियत पर हासिल की. प्रदेश से लेकर केंद्रीय नेतृत्व तक उनकी पैठ थी. उनकी बातें सुनी जाती थी. अधिकारी भी उनकी बातों को नजरअंदाज करने की साहस नहीं करते थे. कोयला मजदूरों का उन्हें स्तंभ इसलिए कहा जाता है कि उनके निधन के बाद मजदूर आंदोलन को वैसी ताकत कभी नहीं मिली. वह कहते रहे कि कोयला उद्योग का उद्देश्य केवल मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि मजदूर और राष्ट्र की खुशहाली सुनिश्चित करना है. मजदूर के अधिकारों पर किसी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं करने वाले नेता थे. आज उनकी कमी कोयला उद्योग के मजदूर महसूस कर रहे हैं.
बेरमो से जब वह धनबाद पहुंचते थे, तो लोगों का हुजूम जुट जाता था
बेरमो से जब वह धनबाद पहुंचते थे, तो लोगों का हुजूम जुट जाता था. समस्याओं को सुनने समझने की उनमें गजब की क्षमता थी. राजेंद्र बाबू बिहार में दो बार मंत्री रहे, साथ ही झारखंड में भी हेमंत सोरेन की सरकार में ऊर्जा, स्वास्थ्य, वित्त और संसदीय कार्य मंत्री रहे. वह इंटक के राष्ट्रीय महामंत्री भी थे. बेरमो विधानसभा से छठी बार वह प्रतिनिधित्व कर रहे थे कि उनका निधन हो गया. 1985 से 2005 तक लगातार कांग्रेस के टिकट पर बेरमो से विधायक बनते रहे. 2005 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. 2009 में फिर उन्होंने इस सीट पर जीत दर्ज की. फिर 2014 में हारा, लेकिन 2019 में छठी बार जीत दर्ज की.
बिहार के गया ज़िले के मूल रूप से रहने वाले थे
वह मूल रूप से गया जिले के रहने वाले थे. 70 के दशक में वह बेरमो आए और फिर बेरमो के होकर ही रह गए. उन्होंने सीसीएल में नौकरी की. इस दौरान मजदूरों का दर्द देख कई आंदोलन भी किये. उसके बाद बेरमो के लोगों ने राजेंद्र बाबू को हाथों-हाथ ले लिया. फिर नौकरी छोड़कर सक्रिय राजनीति में शामिल हो गए. 1985 में बेरमो से कांग्रेस पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर पहली बार विधायक बने. बेरमो कोयलांचल से ही मजदूर राजनीति की शुरुआत कर केंद्रीय श्रम मंत्री और बिहार के मुख्यमंत्री तक पहुंचने वाले कांग्रेस नेता बिंदेश्वरी दुबे ने उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया था. 1985 के बाद राजेंद्र बाबू कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. उनके बड़े पुत्र अनूप सिंह फिलहाल बेरमो से कांग्रेस के विधायक हैं.

